माना तू टुकड़ा ही सही एक कागज का ,लिखा जाता है उसी पर इतिहास दुनिया का 

“माना तू टुकड़ा ही सही एक कागज का लिखा जाता है उसी पर इतिहास दुनिया का 
कागज कागज को मिलाकर किताब बनती है तासीर हो कलम में तो किताब कालजयी बनती है “

कब और क्यों मनाया जाता है ? विश्व पुस्तक दिवस 
  

आज यानी  23 अप्रैल को पूरे विश्व में ब्रिटेनऔर आयरलैंड  को छोड़कर विश्व पुस्तक दिवस के रूप में मनाया जाता है  इसकी शुरुआत 1995 से यूनेस्को द्वारा हुई थी । बताया जाता है कि महान साहित्यकार शेक्सपियर  का निधन  23 अप्रैल 1564 को हुआ था  उसी की याद में  उन्ही की स्मृति में , उन्ही के सम्मान में भी  यूनेस्को  द्वारा 1995 से  विश्व पुस्तक दिवस मनाए जाने की घोषणा की , वहीं भारत सरकार के द्वारा  सन 2001 से इसे  स्वीकार कर मनाया जाने की शुरुआत की  तब से लगातार इसे  मनाया जाता रहा है । इसके अतिरिक्त  विश्व पुस्तक दिवस मनाए जाने के पीछे  अनेक कहानियां  अनेक किस्से और अनेक घटनाएं  बताई जाती है  । 

पुस्तक मेरे जीवन का अहम हिस्सा है जब से होश संभाला तब से पुस्तकों से मेरा नाता रहा है  पुस्तक अध्ययन ,अध्यापन , और लेखन से आज भी मेरा गहरा संबंध रहा है लेकिन फिर भी मैं अपने आपको लेखक नहीं कहूंगा क्योंकि लेखक होने के लिए जो शब्द भंडार होने की आवश्यकता है शब्दों में जो तासीर होना आवश्यक है  वह तासीर शायद अभी तक मेरे कलम में मेरे शब्दों में नहीं है । आज भी पुस्तक अध्ययन लेखन दिनचर्या का एक अहम हिस्सा है यात्रा के दौरान जहां कहीं भी जाता हूं रेलवे स्टेशन हो या बस स्टैंड पर पुस्तक भंडार  हूँ सहज ही वो मुझे अपनी और आकर्षित कर लेती है  पुस्तक पढ़ना ,खरीदना, लेखन में मेरी रूचि भी रही है और अभी रुचि भी ऐसे में में विश्व पुस्तक दिवस को अपने मन ,मस्तिष्क से विस्मृत कैसे कर सकता हूँ ।

मेरा मानना है कि पुस्तकें ज्ञान तथा नैतिकता की संदेशवाहक, अखंड सम्पत्ति, भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृति हेतु एक माध्यम का काम करती हैं । पुस्तके व्यक्ति की सच्ची  साथी होती है । कहा जाता है कि ज्ञान ही शक्ति है और एक ज्ञान हमें पुस्तकों के माध्यम से ही प्राप्त होता है क्योंकि पुस्तके ही समाज का दर्पण होती है पुस्तके हमें जानने की जिज्ञासा उत्पन्न करती है पुस्तके हमें ज्ञान प्रदान करती है यह हमें चिंतन करने का अवसर और एकांकी पन दूर करने में सहयोग प्रदान करते हैं कोविड-19 के दौर में पुस्तक प्रेमियों ने लॉक डाउन का समय इन्ही पुस्तको के सहारे बिताया, लोगो ने पुस्तक पढ़ने, लेखन में अपना वक़्त गुजारा, सकारात्मक रूप में गुजारा,। यही पुस्तके इस एकांकीपन को दूर करने में सार्थक साबित हुई थी जीवन में पुस्तकों का महत्व समझ में लोगों को आया था। 
पढ़ना, प्रकाशन और प्रकाशनाधिकार को पूरी दुनिया में लोगों के बीच बढ़ावा देने के लिये यूनेस्को द्वारा  इसे मनाये जाने की शुरुआत की थी। फिर से जितने भी दिवस उत्सव होते हैं उनका निर्धारण विदेशियों के द्वारा ही किए गए उनकी संस्कृति सभ्यता और ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर ही आज पूरा विश्व  विभिन्न दिवस के रूप में मनाता रहा है निसंदेह शेक्सपियर का योगदान साहित्य क्षेत्र में अमूल्य है लेकिन कालिदास जैसे अनेक साहित्यकार हमारे देश में  होते हुए भी हम  विदेशी संस्कृति  का अनुसरण करते आ रहे हैं । भारतीय संस्कृति ,सभ्यता और इतिहास और क्या ? भारतीय इतिहास पुरुष ,लेखक इतने समृद्ध नहीं है कि हम अपने इतिहास, अपनी सभ्यता और अपनी संस्कृति और अपने इतिहास पुरुषों के जीवन को आधार मानकर ही दिवस और उत्सव मनाने की परंपरा विकसित करें ।

जहां तक विश्व पुस्तक दिवस की बात है क्या ? भारतीय ऐतिहासिक पुस्तकें गीता ,महाभारत, रामायण और कौटिल्य की अर्थशास्त्र के साथ-साथ ऐसी सैकड़ों पुस्तके है ,  सेकड़ो  कालजयी साहित्यों की रचना  हमारे देश मे हुई है ,सैकड़ों लेखक हुए हैं सैकड़ों इतिहास पुरुष हुए हैं ,सैकड़ों ऐतिहासिक ग्रंथ हुए हैं ,क्या ?  उनको आधार मानकर हम अपना स्वयं का राष्ट्रीय पुस्तक दिवस मनाए जाने की शुरुआत नहीं कर सकते । कब तक हम विदेशी संस्कृति सभ्यता और परंपराओं का अनुसरण करते रहेंगे। कब देश अपनी राष्ट्रीय पहचान को विकसित करेगा राष्ट्रीय पहचान को बरकरार रखने का कदम उठाएगा क्या आज इसकी आवश्यकता महसूस नहीं की जाती है । 

कुछ यूं मनाईये यह दिवस 


जाने-माने विद्वान और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था कि वह व्यक्ति मेरा सच्चा मित्र होता है जो मुझे एक ऐसी पुस्तक भेंट करें जो मैंने पूर्व में नहीं पढ़ी हो ।  आज के इस भौतिकवादी युग में आज की युवा पीढ़ी द्वारा आपस मे विभिन्न अवसरों पर गिफ्ट और उपहार दिए जाने की संस्कृति का विकास हुआ है । महंगे महंगे उपहार प्रदान किए जाते हैं जो व्यक्ति के जीवन में केवल सजावट की वस्तु के अलावा और कुछ नहीं होती ।कितना अच्छा हो कि आज की युवा पीढ़ी को अपनी सभ्यता अपनी संस्कृति से परिचित परिचित कराने के लिए, उनके जीवन में सकारात्मक संदेश देने के लिए , उनके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भरने के लिए,  उनके जीवन में काम आने वाली पुस्तकें भेंट की जाए,.. जो भले ही किसी कमरे की सजावट  के काम न आये  लेकिन वह व्यक्ति के जीवन को एक नई दिशा जरूर देगी  तभी विश्व  पुस्तक दिवस मनाए जाने का हमारा उद्देश्य सार्थक साबित हो सकता है ।

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