हमारा धर्म हमें हमारी संस्कृति और सभ्यता से जुड़े रखता है हमें नैतिक शिक्षा देता है हमें आत्मविश्वास देता है, धर्म मे विश्वास करो अंधविश्वास नही ।=========================≠==
        पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में बबेरू कोतवाली क्षेत्र के भाटी गांव में एक युवक ने कथित रूप से अपनी जीभ काट कर मंदिर में चढ़ा दी। भाटी गांव में युवक आत्मा राम (32) ने शनिवार सुबह खेरापति के मंदिर में पूजा करने के बाद वहां अपनी जीभ काट कर चढ़ा दी। आखिर धर्म के नाम पर यह कैसा अंधविश्वास हमें विश्वास ही नहीं होता कि आज 21वीं सदी में जी रहे हैं । आज समाज अपने आप को चाहे जितना भी आधुनिक माने, चाहे कितने विकास के दावे करें ,चाहे शिक्षा का कितना ही विस्तार हो रहा हो,  लेकिन अंधविश्वास आज भी हमारे समाज में गहरी पैठ जमाए हुए हैं । आज भी भूत प्रेत डायन चुड़ैल झाड़-फूंक टोटका बलि प्रथा और धर्म के नाम पर न जाने कौन सी कौन सी परंपराएं जिनको हम न तो मानवीय कह सकते हैं और नहीं नैतिक जैसे अंधविश्वास का अस्तित्व हमारे समाज में विद्यमान है । सवाल उठता है कि इसके लिए स्वयं व्यक्ति जिम्मेदार है या हमारा समाज जो पीढ़ी दर पीढ़ी समाजीकरण की प्रक्रिया के तहत बच्चों में ऐसे अंधविश्वासों को आगे बढ़ा रहे हैं ।  
 यह भी एक सच्चाई है की संतान,  संपत्ति और पारिवारिक समस्याओं से घिरे हुए समस्याओं से समाधान जाने वाले व्यक्ति, लोग ऐसे अंधविश्वास के अधिक शिकार होते हैं ।महिलाएं अपनी धार्मिक प्रवृत्ति के कारण अंधविश्वास की अधिक शिकार होती है ओझा और तांत्रिकों के चंगुल में व्यक्ति बच्चे की बलि देने जैसे मानवीय कृत्य करने के लिये भी आमादा हो जाते हैं ।  समझ में नहीं आता कि यह कैसी नासमझी, यह कैसा धर्म  और धर्म के नाम पर अंधविश्वास का अंधेरा ।

धर्म हमारी संस्कृति और हमारे जीवन का अहम हिस्सा हैं


    हमारा धर्म हमें हमारी संस्कृति और सभ्यता से जुड़े रखता है ,हमें नैतिक शिक्षा देता है, हमें आत्मविश्वास देता है । धर्म हमारी संस्कृति और हमारे जीवन का अहम हिस्सा है  इसीलिए हमारी संस्कृति को सनातन संस्कृति कहा जाता है । , हमारा धार्मिक होना , अपने अपने धर्म में विश्वास करना , अपनी अपनी धार्मिक परंपराओं और संस्कृति का पालन करना गलत नहीं है । हमारा धर्म हमें अपनी संस्कृति  से अपनी सभ्यता और अपने इतिहास से जोड़े रखता है । धर्म हमारे समाज में  और व्यक्ति में आत्मविश्वास पैदा करता है । समाज को संगठित रखता है , हमें अपने धर्म से अपनी संस्कृति से , अपनी परंपराओं से जुड़े रहना है , लेकिन धर्म और परंपरा के नाम पर अमानवीय , गैर सांस्कृतिक परंपराओं में विश्वास करना हमारा धर्म नहीं है । हमें धार्मिक होना चाहिए , हमें धर्म में विश्वास करना चाहिए पर हमारा धर्म हमें ऐसी अमानवीय और गैर सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं देता है । हमें धर्म विश्वास करना चाहिए अंधविश्वास नहीं । 
   सच्चाई का एक पहलू यह  है कि  अशिक्षित और  गरीब ,  ग्रामीण लोग इसके अधिक शिकार होते हैं लेकिन सच्चाई के दूसरे पहलुओं से हम मुंह नहीं मोड़ सकते,  उसे नकारा नहीं जा सकता कि समाज का शिक्षित वर्ग भी इस अंधविश्वास के प्रभाव का शिकार हो गया है । जब समाज का शिक्षित वर्ग ही अंधविश्वास का शिकार हो जाएगा तो ऐसी स्थित में  ग्रामीण ,गरीब ओर अशिक्षित लोगों से क्या आशा और अपेक्षा की जा सकती है । यह सवाल यह उठता है और उठना स्वाभाविक  भी है कि शिक्षित वर्ग ही अंधविश्वास के अंधेरे में भटक जाएगा तो समाज को अंधेरे से उजाले की राह कौन दिखाएगा । 

कानून के साथ जागरूकता भी जरूरी


धर्म-कर्म तंत्र परंपराओं तंत्र मंत्र प्रथाओं के नाम पर आखिर कब तक यह अंधविश्वास का अंधेरा यूं ही खिलाया जाता रहेगा । सरकार के द्वारा समय-समय पर ऐसे अनेक कानूनों का निर्माण भी किया जो समाज से अंधविश्वास के अंधेरे को हटाने में मददगार साबित हुए हैं लेकिन हम केवल कानून के आधार पर ही ऐसी  परंपराओं और अंधविश्वास के अंधेरे को नहीं मिटा सकते  । अंधविश्वास की प्रथा और परंपराओं धर्म और कर्म के नाम पर अपनी ही जीव काट कर चढ़ाने जैसे कृत्य के लिए समाज और समाज जिम्मेदार है तो समाज को ही अपनी सोच में परिवर्तन लाना होगा । समाज को समझना होगा कि अपने स्वार्थों के लिए ऐसे परंपराओं को जन्म देना हमारा धर्म नहीं है और ना ही हमारा धर्म ऐसी अनुमति देता है । अतः समाज के शिक्षित वर्ग को अंधविश्वासों का दामन छोड़ समाज में ऐसे अंधविश्वासों को मिटाने की पहल करनी होगी क्योंकि शिक्षित वर्ग ही समाज से विद्यमान अंधविश्वास के अंधेरों में लोगों को उजाले की नई राह दिखा सकता है।  कानून के साथ-साथ समाज को जागरूक होना भी आज की आवश्यकता है ।

81 thoughts on “अंध विश्वास का अधेरा आखिर कब तक”
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