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हमारा  देेश और प्रदेश आध्यात्मिकता, पौराणिकता और ऐतिहासिकता को समेटे हुए है  हजारों- वर्षो  से  यही परंपरा  चली आ रही है युगों- युगों  से धर्म ओर आध्यात्मिकता तथा धार्मिक ओर आस्था के केंद्र मंदिर हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा है ।
  जब धर्म और आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व के प्राचीन मंदिरों के महत्व के प्राचीन मंदिरों की बात होती है तो  भूमि राजस्थान के अजमेर जिले में केकड़ी तहसील में बघेरा के नाम से प्रसिद्ध एक कस्बा जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है ।प्राचीन कला संस्कृति और सभ्यता को अपने में समेटे हुए यह छोटा सा कस्बा  पौराणिक , आध्यत्मिक ऐतिहासिक प्राचीन और पुरातात्विक दृष्टि से एक अलग ही महत्व और स्थान रखता है ।

  • बघेरा का परिचय

  बघेरा के नाम से जाने जाने वाला यह कस्बा  कभी व्याघ्रपुर नाम से जाना जाता था जिसका वर्णन आज से करीबन 5000 वर्ष पूर्व भी मिलता है स्कंदपुराण में इसी बघेरा   वर्णन व्यघ्रपादपुर नाम से वर्णीत ओर  उल्लेखित हुआ है इससे इस कस्बे की प्राचीनता, ऐतिहासिकता का अंदाज और अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है इस कस्बे में ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व के मंदिर ओर इमारते और कलाकृतियां आज भी अपना ध्यान सहज आकर्षित करती है  ओर अपना इतिहास बयां कर रहे है        ऐतिहासिक और पौराणिक की इस नगरी को आम बोलचाल की भाषा में ” बाराजी का गांव ”  के नाम से पुकारा जाता है इसके पीछे ऐतिहासिक और पौराणिक प्रमाण भी रहे हैं  बघेरा अनेक आध्यात्मिक  स्थल मंदिर प्राचीन मंदिर और ऐतिहासिक धरोहर तथा यहां की पुरातात्विक सामग्री अपना इतिहास बयान कर रहे हैं परंतु कस्बे  की पहचान का मुख्य केंद्र यहां का ऐतिहासिक, पौराणिक और कलाकृति का प्रतिरूप शुर वराह की मूर्ति और वराह मंदिर है

कण-कण में इसके आध्यात्म छुपा है हर एक कण में पूरा इतिहास छुपा है 
छुपा है हर जुबां पर इसका गुणगानहर सांस में छुपा  इसका स्वाभिमान है
शुर वराह मंदिर और उसका ऐतिहासिक परिदृश्य

    बघेरा कस्बे के उत्तर दिशा की तरफ लगभग 300 एकड़ क्षेत्र में फैली हुई पवित्र और पौराणिक झील है  जिसे ‘ वराह सागर झील”  के नाम से जाना जाता है इस झील के किनारे विश्व प्रसिद्ध शुर वराह का भव्य  ओर ऐतिहासिक मंदिर स्थित है इस  प्राचीन और भव्य मंदिर  का इतिहास काफी पुराना रहा है इसका जीर्णोद्धार आठवीं शताब्दी से पूर्व के मंदिरों के अवशेषों पर संवत 1600  के आसपास मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह के समय में बेगू के राव  सवाई मेघ सिंह जिसे ‘काली मेघ ‘ के नाम से भी जाना जाता है उन्होंने इस मंदिर का नए सिरे से  करवाया था यह एक ऐतिहासिक तथ्य भी है   तथा इस मंदिर में भगवान विष्णु के तीसरे अवतार महावराह कि दसवीं शताब्दी से पूर्व की निर्मित प्रतिमा को स्थापित किया था।  एक जनश्रुति भी है की बघेरा के इस  भव्य शुर वराह मंदिर में जो मूर्ति स्थापित है वह  वराह सागर झील में ही एक टीले की खुदाई से प्राप्त हुई थी जिस स्थान पर यह मूर्ति निकली है आज भी उसे वराह भट्टी के नाम से जाना जाता है जहां पर पानी भर जाने पर  आज भी बुलबुले निकलते है

  • मूर्ति की ऐतिहासिक कहानी     

बघेरा के वराह सागर में मूर्ति निकलने के पीछे भी एक ऐतिहासिक कहानी है l यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह के समय में बेगू के राव मेघ सिंह बादशाह जागीर के यहां आगरा में थे उनकी जागीर में मालपुरा जो आज  टोंक जिले में है मालपुरा से बेगू का मार्ग बघेरा होकर ही जाता था यह बघेरा नगर इसी प्रकार 6 मार्गों को जोड़ता था  ऐसा माना जाता है और बेगू के राव मेघ सिंह की यात्रा के दौरान  झील कें पूर्वी छोर पर स्थित एक यूप था जिस पर लिखा था”  एक तीर पर धन ” इसी युप के इशारे के आधार पर बेगू राव साहब ने उस टीले की खुदाई की जहां पर उक्त प्रतिमा निकली थी जिस स्थान पर यह प्रतिमा निकली उसे फराह भक्ति के नाम से पुकारते हैं जहां भी आज पूजा पाठ का आयोजन किया जाता है कस्बे का यह मंदिर जानेमाने इतिहासकारों लेखनी में भी अपना स्थान बना चुका है इतिहास विषय पर लिखी गई अनेक पुस्तकों ,और बघेरा का इतिहास विषय पर लिखी गई अनेक पुस्तकों , बृजमोहन जावलिया  जैसे अनेक इतिहासकारों ने अपनी पुतको में  इस वैभवशाली प्राचीन मंदिर का उल्लेख किया है।

  • क्यों विशेष है  शूर वराह  की प्रतिमा


  निसंदेह इसआध्यात्मिक राष्ट्र में मूर्तियों और मंदिरों के  बारे में यही ही कहा जा सकता है कि यहां मंदिर और मूर्तियों की भव्यता और सुंदरता तथा कलाकृति की कोई सीमा नहीं है फिर भी शुर वराह मंदिर बघेरा में स्थित  यह प्रतिमा अपने  आप में  अद्वितीय हैं  ।

     यह प्रतिमा  एक विशाल प्रतिमा होने के साथ-साथ कलाकृति का एक अनुपम नमूना है   इसका आकार अनुमानित रूप से  4″2″6 फिट है जो कि भगवान विष्णु का  अवतार है  वराह रूप में एक पशु की इस संरचना को मूर्तिकार ने जिस रूप में बनाया है वह कल्पना से परे है भगवान विष्णु का यह रूप  आद्वित्य  हैं काले पाषाण से बनी यह प्रतिमा जिस पर हजारों की संख्या में छोटी-छोटी प्रतिमाओ, कलाकृतियां  उत्कीर्ण है ।उन्हें देखकर सहज जी लोग  दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाते हैं इस प्रतिमा की बनावट का आकार और इस पर की गई बारीक कलाकृति को शब्दों में पिरो कर वर्णन करना संभव नहीं है ।  इस रूप में भी विष्णु के समस्त आयुध, शंख, चक्र, गदा पद्म, अपने चारों पैरों में धारण किए हुए हैं शेष शैया पर क्षीर सागर में शयन करना विष्णु को बहुत प्रिय है इसे भी विग्रह शेषनाग को सैया के रूप में दिखाया गया है , चारों पैरों के बीच में कुंडली मारकर शेषनाग अपने फनो को भगवान की स्तुति में मुख के नीचे किए हुए हैं शेषनाग के इन फर्नो के अंदर दोनों नाग  कन्या ईगला – पिगला इणा पीणा भी भगवान की स्तुति करती हुई दिखाई गई  शेषनाग मेंरुदण्ड में स्तिथ  सुशुम्र  का प्रतीक और फन इन्द्रियों ओर इणा, पीणा  दाई ओर बाई दोनों नाड़ियो  तथा बराही नाडी के स्थान को दर्शाती  है मस्तिष्क पर रासलीला चक्र का होना पीठ पर सात समुंदर और सात  लोक जिनमें चरा- चर विश्व में जीव मात्र की सभी क्रियाओं का विस्तार सहित चित्रण किया जाना समुंद्र मंथन के समय देवताओं और असुरों ने शेषनाग को नेज के रूप में काम में लिया और 14 रत्न नवनीत के रूप में प्राप्त किए थे उन्हें भी उक्त  में  समाहित किया गया है इसी प्रकार मल युद्ध ,नृत्य, स्नान गायन यहां तक कि अन्य सभी ग्रहों को भी इस में दर्शाए जाना इस प्रतिमा को एक अलग ही महत्व प्रदान करते हैं  साथ ही वीणा बजाते हुए नारद भी भगवान की इस प्रतिमा में उत्कीर्ण किया हुआ है  ।इन सभी विशेषताओं से शुर वराह  की प्रतिमा मनमोहक और  आकर्षित है  जो  हर किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती  है साथ ही बताया जाता है कि शास्त्रों में जिस प्रकार का वर्णन वराह का पृथ्वी को धारण किये जाने का वर्णन किया गया है उसी वर्णन के तहत इस प्रतिमा को बनाया गया था साथ ही यह भी एक किवदंती है और बताया जाता है कि विश्व में इस प्रकार की यही  एकमात्र अनुपम कलाकृति है।
पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार “चमकते हुए श्याम पाषण की शुकर रुप वराह की यह विशालकाय मूर्ति उनके अनुसार देखी हुई वराह की सब मूर्तियों में सर्वाधिक सुंदर प्रतिमा है।”

  • सरंक्षित धरोहर विकास की है आज भी दरकार


       धरोहर संरक्षण अधिनियम 1961 के तहत  बरसों पहले यहाँ नीला बोर्ड लगा कर इस मंदिर को संरक्षित घोषित जरू र कर रखा है लेकिन यह नीला बोर्ड केवल औपचारिकता मात्रा प्रतीत होता है  यह जरूर है कि पिछली अशोक गहलोत सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में इस पर 50 लाख स्वीकृत कर विकास कार्यो की शुरुआत की थी  लेकिन उसके बाद इसकी कोई सुध नही ली यह राशि ऊँट के मुंह में जीरा साबित हुई और विकास कार्य आज भी अधूरे पड़े हैं l यह उस पुत्र की तरह नजर आता है जिसे गोद लेकर उसका अपने आपको संरक्षक घोषित कर उसे अपने हाल पर लावारिश की तरह छोड़ दिया जाये lआज आवश्यकता है तो इसके पर्यटन के विकास की यह क्षेत्र और यह मंदिर पर्यटन क्षेत्र में शुमार टोडारायसिंह, बिसलपुर ,अजमेर , सवाई माधोपुर मार्ग पर पड़ता है यदि  यहां विकास कार्य को अंजाम दिया जाए  पर्यटकों की सुविधाओं के लिए विकास कार्य किया जाए तो निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति और उसकी इस ऐतिहासिक और आध्यत्मिक धरोहर  से हम देश-विदेश के नागरिकों को परिचित करवा सकते हैं ओर साथ ही इस धरोहर को बचाया जा सकता है l क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा हों सकते है  इसलिए आज राजस्थान के इस ऐतिहासिक आध्यात्मिक पौराणिक कस्बे और शुर वराह मंदिर बघेरा में पर्यटन विकास की दरकार है और यह क्षेत्र एक पौराणिक और आध्यात्मिक कस्बा रहा है जहां पर प्राचीन मंदिरों की भरमार है यहां खुदाई में पुरातात्विक सामग्री प्राप्त होती है सिर्फ आवश्यकता है तो सरकार और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की l आज भी इंतजार है उस ऐतिहासिक और भागीरथ व्यक्ति की जो इस क्षेत्र का पर्यटन की दृष्टि से विकास कर अपना नाम एक भागीरथी प्रयास में शामिल करें ।

5 thoughts on “बघेरा में विष्णु के दशावतार भगवान वराह की अद्वितीय प्रतिमा है”
  1. वाराह भगवान चौलुक्य वंश के प्राचीन कुल देव है सौरमघाट सौरू वराही माता गोविन्द देव सोलंकी टोडा की कुलदेवी कही गयी है टोडा राय सिह मे वराही माता का मन्दिर भी है जो बघेरा के समीप ही है बघेरा पहले सोलंकी राजपूतों था

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