POPULAR POST · May 24, 2021 2

आज भी इस गांव में है व्याघ्रपाद ऋषि आश्रम के अवशेष !

धर्म, अध्यात्म, सांस्कृतिक मूल्यों, गौरव ,शौर्य और स्वामीभक्ति की अमर कथाओ की  पर्याय हमारी  यह धरा अपने आंचल में अनेक, धार्मिक, पौराणिकता ,आध्यात्म तथा सभ्यताओं संस्कृतियों और इतिहास को  समेटे हुए हैं । यह समय की गति ही कही जाएगी कि  धर्म , सभ्यता ,संस्कृति अध्यात्म के केंद्र के रूप में रहने वाले कई  स्थान आज लुप्त हो चुके हैं या फिर खंडहर के रूप में अपनी गाथायें बयां कर रहे हैं।

परिचय     

अजमेर जिले का बघेरा कस्बा भी धर्म, अध्यात्म, पौराणिकता को अपने आप मे समेटे हुए कस्बा रहा है जिसका उल्लेख विभिन्न पौराणिक, ओर धार्मिक ग्रंथो, इतिहासकारो के ग्रंथ के उल्लेखित है साथ ही  प्राचीन मंदिर, इमारते, खंडर आदि के अवशेष आज भी अपनी कहानी खुद ब खुद बयां कर रहे है ।  कस्बे में स्थित अनेक धर्म और आध्यत्म से सम्बंधित अवशेष  आज  भी हर  किसी का ध्यान सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेते  है लेकिन धर्म और आध्यत्म के केन्द्र रहे वो स्थल आज  उचित देखभाल और सारसंभाल के अभाव में अपना अस्तित्व खो चुके है या अपने अस्तित्व  के लिये संघर्ष कर रहे है ।

  धर्म और आध्यात्मिक , ऐतिहासिक इमारतों के साथ-साथ इस पावन धरा का संबंध अनेक प्रसिद्ध ऋषि, मुनियों  से भी रहा है  साथ ही यह अनेक ऋषि मुनियों की तपोभूमि भी रही है ।जिनका उल्लेख अनेक  धार्मिक ,पौराणिक और ऐतिहासिक ग्रंथों में  है इसी क्रम में महान तपस्वी, ऋषि, व्याघ्रपाद ऋषि का  संबंध  भी इस पावन धरा  से रहा है।
   कण-कण में इसके आध्यात्म छुपा है          

हर एक कण में पूरा इतिहास छुपा है          

छुपा है हर जुबां पर इसका गुणगान         

हर सांस में छुपा  इसका स्वाभिमान है

बघेरा में आज भी है व्याघ्रपाद ऋषि आश्रम के अवशेष


बघेरा कस्बे की  दक्षिण दिशा की तरफ डाई नदी के मध्य में एक टापू पर हनुमान मंदिर है जिन्हें रेड वाले बालाजी के नाम से जाना जाता है  लेकिन कस्बे में डाई नदी के किनारे इस मंदिर परिसर में  क्या कुछ विशेष है क्या इसका महत्व रहा है आइए जानते हैं ।

आश्रम में मंदिर


मंदिर एक टापू के रूप में स्थित है इस टापू के चारों तरफ बड़ी-बड़ी पत्थर की लांगड़िया (पत्थर के शिलाखंड ) से चारदीवारी बनी है । बड़ी बड़ी लांगडियो (पत्थर की शिलाखंड) से बड़ी बड़ी बावडिया बनी हुई है साथ  खण्डित अवस्था में मंदिर, साधू सन्यासियों की समाधियां बनी हुई है जो शायद अब अपना अस्तित्व खो चुके हैं । डाई  नदी जब अपनी पूरी भराव में होती है  तब यह एक टापू का रूप ले लेता है ।  जहां साधु संत  आज भी निवास करते हैं इस परिसर को देखकर सहज ही किसी आश्रम का एहसास हो जाता हैं।

आज भले ही शिक्षा के केंद्र आश्रम और गुरुकुल नही हो  लेकिन बघेरा कस्बे में शिक्षा के केंद्र आश्रम  , गुरुकुल जहाँ वैदिक शिक्षा दी जाती थीं के अवशेष अपना इतिहास बयां कर रहे है निश्चित रूप से इस आश्रम ओर शिक्षा के केंद्र का संबंध भी ऐसे ही किसी ऋषि मुनि  रहा है  वो ऋषि है व्याघ्रपाद ऋषि ।

कौन थे ?  व्याघ्रपाद ऋषि


 पौराणिक महाकाव्य महाभारत और मान्यताओं के अनुसार व्याघ्रपाद ऋषि  वशिष्ठ के गोत्र में उत्पन्न एक प्राचीन ऋषि थे, जो ऋग्वेद के कई मंत्रों के दृष्टा थे।  ये महान ऋषि  उपमन्यु  के पिता थे । दक्षिण भारत की हिंदू पौराणिक कथाओं में  भी व्याघ्रपाद का उल्लेख मिलता है साथ ही व्याघ्रपाद ऋषि के बारे मे अनेक किवदंतिया भी है । 


व्याघ्रपाद महात्म्य में वर्णित


 आज के इस ऐतिहासिक आध्यात्मिक पौराणिक और पुरातात्विक बघेरा कस्बे का संबंध द्वापर काल से भी लगाया जा सकता है । कस्बे में डाई नदी के किनारे मंदिर, साधु- संतों की समाधियां, प्राचीन बावड़ियों के अवशेष आज भी किसी आश्रम का अहसास सहज ही कर देते है  । व्याघ्रपदपुर महात्म्य अनुसार  इस टापू पर द्वापर काल मे व्याघ्रपाद ऋषि का आश्रम हुआ करता था जहाँ देश विदेश से वैदिक शिक्षा ग्रहण करने अनेक शिष्य आते थे । आज भी इस स्थान पर साधु संत निवास है तथा भक्तजनों का तांता लगा रहता है ।


पुराणों में उल्लेखित है 


श्री नंदलाल डे के अनुसार भारतवर्ष में दाविका के नाम से चार नदियां अवस्थित है इसमें एक की महापुराण में महिमा है ,दूसरी वर्तमान की सरयू नदी  , तीसरी सरयू  का दक्षिणी भाग,  और चौथी गोमती -सरयू नदी के नजदीकी कोई नदी है इनसे दाविका नदी का साम्य बघेरा की डाई नदी से किया जाता है। स्कंद पुराण अंतर्गत व्याघ्रपाद महात्म्य के अनुसार  इस नदी की वास्तविक स्थिति  पुष्कर और जम्मू मार्ग के मध्य पुष्कर से करीब 13  गव्यति की दूरी  पर है इस दृष्टि से देखा जाये तो  वर्तमान बघेरा में ढाई नदी ही खड़ी उतरती है तथा इसे प्रमाणित करती है  ।

बघेरा कस्बा एक ऐतिहासिक और पौराणिक, धार्मिक से भी महत्व रखता है इस  दृष्टि से  व्याघ्रपाद ऋषि ओर बघेरा कस्बे के संबधो को बल मिलता है  ।  विदित है कि वर्तमान बघेरा का पूर्व में नाम व्याघ्रपुर/व्याघ्रपादपुर रहा है  जिसका उल्लेख अनेक पुराणों  में भी है साथ ही प्रसिद्ध इतिहासकार गोरी शंकर हीरा चन्द ओझा ने भी व्याघ्रपुर/व्याघ्रपादपुर का उल्लेख किया है ।


वर्तमान में रेड वाले बालाजी मन्दिर  और व्याघ्रपाद ऋषि का आश्रम

आश्रम पर भ्रमण दल

बघेरा में स्थित प्राचीन आश्रम के अवशेष परिसर में आज भी हनुमान मंदिर है इसे रेड वाले बालाजी के नाम से जाना जाता है मंदिर में हनुमान जी  की एक विशाल प्रतिमा जो कि एक ही शिलाखंड से बनी हुई है जहां भक्तजन हर रोज विशेषकर मंगलवार और शनिवार के दिन दर्शन करने आते हैं ।
डाई नदी में इस विशाल क्षेत्र  में फैले हुए आश्रम रूपी परिसर और प्राचीन मंदिर  ,आध्यात्मिक दृष्टि के साथ साथ यह प्राकृतिक रूप से भी अपना महत्व रखता है । हरा भरा यह परिसर  प्रकृतिक सौंदर्य की छटा बिखेरता है, जहां पक्षियों की चहचहाहट ,शीतल हवा यहां आने वाले को तन मन और मानसिक रूप से शीतलता प्रदान करता  है जो हर किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेता है ।