किसी भी देश की शासन व्यवस्था  में औऱ शासन और सरकार में जब किसी बड़े अधिकारी या प्रशासक पर विधानमंडल में अपराध का दोषारोपण होता है  और उसे हटाये जाने की एक निश्चित प्रक्रिया को अपनाया जाता है इस प्रक्रिया को ही महाभियोग कहा जाता है।  इसे  अंग्रेजी में   impeachment  कहा जाता है । 

 संसदीय शासन  व्यवस्था की विशेषताओ वाले भारतीय  संविधान  में  राज्याध्यक्ष राष्ट्रपति तथा उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उनके  कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व हटाए जाने के लिए जिस प्रक्रिया व प्रावधान का उल्लेख किया गया है उस  प्रावधान और प्रक्रिया को महाभियोग(  impeachment ) कहां गया है महाभियोग का यह प्रावधान  संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है। लेकिन भारत में राष्ट्रपति पर महाभियोग का प्रावधान का आधार आयरलैंड के संविधान का अनुच्छेद 12(10) है न कि अमेरिका का संविधान । संविधान के अनुच्छेद 56, 61,(राष्ट्रपति) अनुच्छेद 124 (4), (5),(न्यायाधीश sc) अनुच्छेद 217 और 218 (न्यायाधीश HC) में उल्लेख मिलता है.।

  • महाभियोग का अधिकार किसे

भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति तथा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश और  उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व हटाए जाने के लिए संसद के द्वारा महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है राष्ट्रपति हो या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में 14 दिन की पूर्व सूचना पर  चाहे वह लोकसभा हो या फिर राज्यसभा किसी भी में लाया जा सकता है दोनों सदनों को बराबर बराबर अधिकार प्राप्त है ।

  • महाभियोग एक अर्ध न्यायिक प्रक्रिया है । 

सामान्यतया  राष्ट्रपति तथा  उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया को महाभियोग कहा जाता है लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ‘ महाभियोग ‘ शब्द संविधान में केवल राष्ट्रपति को हटाए जाने के लिए ही प्रयुक्त हुआ है अन्य के लिए नहीं ।

  • महाभियोग के आधार  में अन्तर

संविधान के अनुसार राष्ट्रपति पर महाभियोग का उल्लेख अनुच्छेद 56 में है । जिसके अनुसार ‘ संविधान का अतिक्रमण ‘ करने पर राष्ट्रपति को कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व ही एक निश्चित प्रक्रिया (अनुच्छेद 61)  के तहत महाभियोग लगाकर हटाया जा सकता है ।

उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर साबित कदाचार एवं असमर्थता दो आधारों पर ही संसद के द्वारा एक निश्चित प्रक्रिया से हटाया जा सकता है ।  अनुच्छेद 124(5) । न्यायाधीशों को हटाए जाने की पूरी प्रक्रिया का उल्लेख न्यायाधीश ( जांच)  अधिनियम 1968 में है किसी अनुच्छेद  में नही , और इस अधिनियम का निर्माण भारतीय संसद के द्वारा किया गया है।

  • महाभियोग की प्रक्रिया में अन्तर

* संविधान के अनुच्छेद 61 के तहत राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख है जो  महाभियोग कहलाती है और महाभियोग शब्द का उल्लेख केवल राष्ट्रपति के लिए ही है । इस प्रक्रिया को तीन चरणों से गुजरना पड़ता है प्रथम चरण में संकल्प  दूसरे चरण में संकल्प पारित करना और तीसरे चरण में महाभियोग। 

राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया संसद के किसी भी सदन में शुरू की जा सकती है 14 दिन की पूर्व सूचना के आधार पर ऐसा प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है जिस सदन में यह प्रस्ताव लाया जाता है उस सदन के कुल सदस्यो के एक चौथाई सदस्यों द्वारा सहमति आवश्यक है । 

न्यायाधीशों के मामले में संकल्प के लिए जो प्रक्रिया अपनाई गई है वह राष्ट्रपति की प्रक्रिया से थोडी  भिन्न है । न्यायाधीश पर महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है लेकिन शर्त यह है कि अगर यह प्रस्ताव लोकसभा में लाया जाता है तो 100 सदस्यों तथा राज्यसभा में लाया जाता है तब 50 सदस्यों की सहमति आवश्यक है । इस बात का उल्लेख न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968  में है 

* जिस सदन में आरोप लगाए गए हैं उसके द्वारा इसकी जांच करवाई जाती है न्यायाधीशों के मामले में भी । त्रि सदस्य वाले समिति के द्वारा जांच की जाती है । 

* 14 दिन पूर्व की सूचना दिए जाने का उद्देश्य राष्ट्रपति एवं या उसके द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि के माध्यम से जांच करने वाले सदन या निकाय/ समिति के समक्ष अपना पक्ष रख सकता है । यही प्रक्रिया न्यायाधीशों के मामले में अपनाई जाती है ।

*  राष्ट्रपति के मामले में प्रावधान है की महाभियोग का प्रस्ताव  जिस सदन में प्रस्ताव रखा जाता है उस सदन के द्वारा अपने कुल सदस्य संख्या के कम से कम दो तिहाई बहुमत द्वारा उसे पारित होना आवश्यक है । 

प्रस्ताव पारित होने के लिए न्यायाधीशों के मामले में दोनों सदनों में  कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वालों का दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है ना कि राष्ट्रपति की तरह कुल सदस्य संख्या के दो तिहाई बहुमत की । यह  बहुमत राष्ट्रपति और न्यायाधीशों दोनों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया और बहुमत में सबसे महत्वपूर्ण अंतर है ।

* जिस सदन में महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया और पारित किया  गया है उसे दूसरे सदन में प्रस्तुत कर दिया जाता है । जहां वह  इसकी जांच करता है आरोप सही पाए जाने पर दूसरा सदन भी अगर अपने कुल सदस्य संख्या का दो तिहाई सदस्यों के बहुमत से इसे पारित कर देता है तो वह प्रस्ताव पारित माना जाता है । 

न्यायाधीशों के मामले में भी यही प्रक्रिया अपनाई जाती है लेकिन  न्यायाधीशों के मामले में बहुमत कुल सदस्य संख्या का दो तिहाई बहुमत न होकर कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वालों का दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। 

*  राष्ट्रपति और न्यायाधीशों के मामले में संपूर्ण प्रक्रिया पूरी होने के बाद संकल्प पारित होने / प्रस्ताव पारित होने पर राष्ट्रपति तथा न्यायाधीश को अपना पद छोड़ना पड़ता है ।

* राष्ट्रपति को हटाए जाने की प्रक्रिया के लिए संसद संविधान में महाभियोग शब्द का उल्लेख अनुच्छेद 56 और अनुच्छेद 61 में  है लेकिन न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया के लिये महाभियोग  शब्द प्रयोग नहीं किया गया है । न्यायाधीशों को हटाए जाने का अधिकार भी  राष्ट्रपति की तरह संसद को है भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124( 5 )  में उल्लेख है ।  संसद ने 1968 में न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968 बनाया और इसी अधिनियम के तहत न्यायाधीशों को हटाया जाता है ।

  • महाभियोग  के प्रयोग का इतिहास

*  राष्ट्रपति जिन पर महाभियोग लगाया गया- 

भारतीय संविधानिक इतिहास में न तो अब तक किसी राष्ट्रपति को महाभियोग  से  हटाया गया है और न ही किसी राष्ट्रपति पर अब तक कोई महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी सदन में लाया गया है ।

  • न्यायाधीश जिन पर अब तक महाभियोग लगाया गया 

भारतीय संविधानिक इतिहास में सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर कई बार महाभियोग का प्रस्ताव लाया जा चुका है  । जहां तक सर्वोच्च न्यायालय का सवाल है तो वहां पर अब तक दो न्यायाधीश हैं  ऐसे है जिन पर महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया जबकि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या इससे कई गुना अधिक है ।

  • उच्चतम न्यायालय 

* भारतीय संविधान के इतिहास में सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में पहली बार सन 1991 न्यायमूर्ति वी रामास्वामी के खिलाफ अनियमितताओं के आरोप के आधार पर महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई महाभियोग की जांच हेतु गठित समिति ने न्यायमूर्ति के खिलाफ लगाए गए आरोपों जिनकी संख्या 14 थी ।उनमें से 11 आरोपों को सही माना और 10 मार्च 1993 को न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव प्रस्तुत किया परंतु आवश्यक बहुमत के अभाव में यह प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया ।

* सन 2018 में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं के आधार पर  राज्य सभा मे महाभियोग का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था लेकिन राज्य सभा सभापति ने न्यायमूर्ति  दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव को  ख़ारिज किया ।

  • उच्च न्यायालय 

सन 2009 में कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन को पद से हटाने के लिए महाभियोग का राज्यसभा में प्रस्ताव लाया गया था  । अगस्त 2011 में इस पर मतदान हुआ दो तिहाई बहुमत से पास होने के पश्चात इसे लोकसभा में प्रेषित किया गया लेकिन प्रक्रिया के दौरान ही न्यायमूर्ति सौमित्र सेन ने अपना त्यागपत्र दे दिया था ।

कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी .डी दिनकर के खिलाफ भी महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया था लेकिन सुनवाई से पूर्व ही उन्होंने अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को सौंप दिया था।

* सन 2015 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एस .के.  गेंगले के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया था ।

* सन 2015 में गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जे. बी.पर्दीवाला के खिलाफ महाभियोग का नोटिस राज्य सभा सभापति हामिद अंसारी को भेजा था. यह नोटिस ‘‘आरक्षण के मुद्दे पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल के खिलाफ एक मामले में फैसले को लेकर दिया गया  था लेकिन   इसके कुछ ही घंटों के भीतर  न्यायाधीश ने फैसले से अपनी टिप्पणी को वापस ले ली थी. ।

* सन 2016 में आंध्र और तेलंगाना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति  श्रीं नागार्जुन रेड्डी के खिलाफ महाभियोग चलाने के लिये एक याचिका  राज्य सभा  में प्रस्तुत की थी। 

इनके अतिरिक्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की एक लंबी लिस्ट है जिनके खिलाफ महाभियोग का  नोटिस भेजा गया या प्रस्ताव लाया गया था लेकिन किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ आज तक कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ और न ही उन्हें हटाया गया ।

  •  ध्यातव्य

* भारतीय संविधान लागू (26 जनवरी 1950 ) होने से लेकर अब तक भारतीय संवैधानिक  इतिहास में किसी भी न्यायाधीश को ( उच्चतम न्यायालय / उच्च न्यायालय  ) महाभियोग के द्वारा हटाया नहीं गया है ।

* 15 अगस्त 1947 से  26 जनवरी 1950 तक जब संविधान लागू नहीं हुआ था और भारतीय शासन व्यवस्था का संचालन भारत शासन अधिनियम 1935 के द्वारा संचालित किया जाता था उसी दौरान इलाहाबाद न्यायालय के न्यायाधीश एस .पी सिन्हा पहले  न्यायाधीश है जिनको महाभियोग के द्वारा हटाया गया था । लेकिन संविधान के लागू होने (26 जनवरी 1950)  के पश्चात  उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय किसी भी न्यायालय के न्यायाधीश को  महाभियोग  से हटाया नहीं गया है 

85 thoughts on “भारतीय:-राष्ट्रपति औऱ न्यायाधीशों की महाभियोग प्रक्रिया में क्या है ?अन्तर”
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