सरकार के तीसरे प्रमुख और स्वतंत्र अंग न्यायपालिका में सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 124(2) और उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 217(1) में उल्लेखित है।

नियुक्ति का यह है संविधान में प्रावधान

जहां तक सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया का सवाल है तो इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी और इस बात का प्रावधान संविधान में है। इसके तहत राष्ट्रपति न्यायाधीशों की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश तथा संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श करने के पश्चात करेगा जिनसे वह परामर्श करना आवश्यक समझे लेकिन वर्तमान समय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में कॉलेजियम प्रणाली का प्रावधान(मूल संविधान में नहीं) है।

कॉलेजियम प्रणाली क्या है ? 

देश के अदालतों विशेषकर सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रणाली को कॉलेजियम प्रणाली कहा जाता है । सन 1993 से पहले कॉलेजियम प्रणाली का कोई प्रावधान नहीं था इस समय कोलेजियम में मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त 2 अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों की व्यवस्था थी आगे चलकर इसकी संख्या को बढ़ाकर कर 4 दिया गया।

इस कॉलेजियम प्रणाली में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में 4 अन्य सदस्यों से बनी एक सीनियर जजों की समिति है । कहा जा सकता है कि कोलेजियम पांच लोगों का एक समूह है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश (अध्यक्ष)और 4 अन्य न्यायाधीश(सदस्य) होते हैं। 

इस समिति के परामर्श के बाद ही  सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण किया जाता है। कॉलेजियम प्रणाली में बहुमत द्वारा लिए गए निर्णय जिसमें मुख्य न्यायाधीश शामिल हो के द्वारा दिए गए परामर्श को राष्ट्रपति/सरकार पुनर्विचार के लिए कॉलेजियम को वापस लौटा सकती है लेकिन पुनर्विचार के पश्चात दोबारा वही नाम भेजे जाते हैं तो सरकार परामर्श मानने के लिए बाध्यकारी हैं। 

ध्यातव्य :हालांकि संविधान में कॉलेजियम प्रणाली का कोई प्रावधान नहीं है। उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अंसारी भी इस बात से सहमति रखते हैं कि न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली से ही हो और यही प्रावधान रहना भी चाहिए।

कब अस्तित्व में आई कॉलेजियम प्रणाली ? 

सन 1981 व 1993 और 1998 में सर्वोच्च न्यायालय में आए वाद के निर्णय के तहत कोलेजियम प्रणाली की व्यवस्था अस्तित्व में आई लेकिन वर्तमान रूप में इसका व्यवहार में प्रयोग सुधार के साथ सन 1999 में आया लेकिन इसकी शुरुआत 1993 से हो गई थी।

ध्यातव्य सन 1993 से पूर्व न्यायाधीशों की नियुक्ति में कानून मंत्रालय की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

1981 में आए वाद (एसपी गुप्ता केस ) में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया की न्यायाधीशों की नियुक्ति में राष्ट्रपति के लिए सलाह/परामर्श को मानना बाध्यकारी नहीं है।

1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया की मुख्य न्यायाधीश की राय जो दो अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों के सलाह के बाद दी गई हो परामर्श जो बाध्यकारी होगी के आधार की की जाएगी।  

1998 मे दिए गए निर्णय के तहत भी परामर्श को बाध्यकारी बना दिया था। इसके पश्चात ही न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली का प्रावधान किया गया था जो 1993 में अस्तित्व में आया।  

ध्यातव्य : अप्रैल 2015 तक न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्नांतरण के संबंध में कॉलेजियम प्रणाली का प्रावधान रहा।

कॉलेजियम व्यवस्था की जगह नई व्यवस्था का किया प्रावधान

इस कॉलेजियम प्रणाली के अस्तित्व में आने के लंबे समय के बाद कॉलेजियम प्रणाली पर कई बार सवाल उठे। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण से संबंधित कॉलेजियम प्रणाली की जगह एक नई व्यवस्था की गई। 

इसके तहत ही संविधान में 99 वां संविधान संशोधन विधेयक 2014 लाया गया जिसके तहत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 में संशोधन करते हुए अनुच्छेद 124 A, अनुच्छेद 124 B और अनुच्छेद 124 C जोड़ा गया और सन 2015 में एक नई व्यवस्था का प्रावधान किया गया जिसे राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग( NJAC) कहा जाता है और इस कॉलेजियम व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया ।

उसकी जगह राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) 13 अप्रैल 2015 से कार्यशील प्रभाव में आया। इस नई व्यवस्था के लागू होने के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशो और उच्च न्यायलय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानान्तरण के संबंध में नई व्यवस्था शुरू हो गई। 

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  • ध्यातव्य 1: राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग(NJAC) सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में कॉलेजियम प्रणाली की जगह एक नई व्यवस्था लागू करने के लिए तत्कालीन विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद के द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक 2014  सर्वप्रथम लोकसभा में लाया गया जिसे अगस्त 2014 में संसद की स्वीकृति प्राप्त हो गई और यह 13 अप्रैल 2015 से कार्यशील व प्रभाव में आया तथा नियुक्ति और स्थानांतरण के संबंध में एक नई व्यवस्था का प्रावधान अस्तित्व में आ गया।
  • ध्यातव्य:2  राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक 2014 को सर्वप्रथम लोकसभा में प्रस्तुत किया गया जहां यह 13 अगस्त 2014 को पारित हुआ और अगले ही दिन (14 अगस्त )यह राज्यसभा में पारित हो गया। इसके साथ ही 16 राज्यों के समर्थन के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद 13 अप्रैल 2015 से यह प्रभावी हो गया था। 
  • ध्यातव्य :3:राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) का संगठन: राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग एक 6 सदस्यीय आयोग है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश (अध्यक्ष ) तथा सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठ न्यायाधीश( सदस्य ) देश का कानून मंत्री (सदस्य) और एक 3 सदस्यों वाली समिति जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा का विपक्षी दल का नेता और सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश सदस्य होंगे के द्वारा दो अन्य सदस्य बनाए जाएंगे।

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NJAC की जगह फिर लागू हुई कोलेजियम व्यवस्था

कॉलेजियम प्रणाली की जगह राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की व्यवस्था को लागू किया जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय में इसे चुनौती दी गई जिसे कोर्ट ने 5 जजों की पीठ ने 4:1 से फैसला देते हुए इस पूरे अधिनियम को ही अवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया गया । जजों की नियुक्ति के पुरानी व्यवस्था जिसे कॉलेजियम प्रणाली कहा जाता है लागू हो गई। 

देश के कुछ कानूनविदो का यह मानना है कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को रद्द करने के बजाय उसकी जो कुछ कमियां थी उनमें सुधार किया जाना चाहिए था।

फिर से उठने लगे हैं कोलेजियम प्रणाली पर सवाल

न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में कॉलेजियम प्रणाली पर फिर से सवाल उठने लगे हैं । अक्टूबर /नवम्बर 2022 में एक बार फिर यह चर्चा में आया । न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया क्या हो? और क्या वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है ? 

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम के परामर्श पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायाधीशों की ही बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है, इस पर सवाल उठाते हुए कहां जा रहा है कि दुनिया में भारत के अलावा ऐसा कोई देश नहीं है जहां न्यायाधीश ही देशों की नियुक्ति करते हो।

संवैधानिक प्रावधान पर जोर बदलाव की उम्मीद

तत्कालीन समय में देश के कानून मंत्री किरण रिजिजू ने भी इस मामले को जोर-शोर से उठाया और इस और संकेत दिया की वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है। न्यायाधीश की नियुक्ति के बारे में जो संवैधानिक प्रावधान है, उसी आधार पर नियुक्तियां की जाने के प्रावधान पर चर्चा होने लगी है और इस बात पर बल दिया जाने लगा है कि सविधान की भावनाओं के मद्देनजर रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श पर कानून मंत्रालय/राष्ट्रपति द्वारा ही न्यायाधीशों की नियुक्ति हो। अब देखना यह है कि क्या कुछ नया बदलाव होता है और क्या उसने सुधार होता है।

क्या हो प्रावधान ताकि न्यायालय में विश्वास बना रहे 

अब वक्त आ गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में सविधान की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए नियुक्ति की ऐसी प्रणाली अपनाई जानी चाहिए जिसमें कार्यपालिका और न्यायपालिका में समन्वय भी बना रहे और न्यायाधीशों की नियुक्ति में किसी प्रकार का प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक हस्तक्षेप भी न हो और इस लोकतंत्र में जनता को भी यह लगे न्यायिक नियुक्तियों/न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता हो और किसी प्रकार का सवाल और संस्य जनता के मन में ना हो,स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायाधीशों की नियुक्ति हो सके और न्यायपालिका में आम जनता का विश्वास बरकरार रहे।

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