संसदीय शासन प्रणाली में राष्ट्रपति शासनाध्यक्ष कहलाता है । राष्ट्रपति भले ही नाम मात्र की और संविधानिक कार्यपालिका हो लेकिन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 77 के अनुसार संघ सरकार के समस्त कार्य राष्ट्रपति के नाम से होते है। शासन के समस्त कार्य जैसे कार्यपालिका शक्ति , विधायिका शक्ति, न्यायिक शक्ति, विदेश संबंधी और सैनिक शक्तियो के अतिरिक्त और भी शक्तियां प्राप्त है ।

क्या कहता है  संविधान का अनुच्छेद 143 


राष्ट्रपति को  प्राप्त शक्तियों में एक अन्य महत्वपूर्ण शक्तियां भी प्राप्त है । विधिक विषयों पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श लेने की शक्ति । जब किसी मामले में कोई विधिक प्रश्न या विषय सामने आ जाए जिसमें विधिक परामर्श की आवश्यकता हो तो भारतीय संविधान के भाग 5 में अनुच्छेद 143 के अनुसार वह सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांग सकता है। सर्वोच्च न्यायालय भी सम्पूर्ण न्यायिक प्रणाली का आधार और संविधान का रक्षक  है । 


भारतीय संघ की अधिकतम और व्यापक न्यायिक अधिकारिता उच्चतम न्यायालय को प्राप्त हैं।  इसलिये कहा जा सकता है कि भारत का संविधान/भारतीय संविधान के अनुसार उच्चतम न्यायालय की भूमिका संघीय न्यायालय और भारत का संविधान/भारतीय संविधान के संरक्षक की है। 


क्या स्रोत हौ ? इस अधिकार के प्रावधान का


 भारतीय संविधान के विभिन्न प्रावधान विश्व के अनेक संविधानो से प्रभावित है । सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श लेने का राष्ट्रपति का अधिकार का मुख्य स्रोत भारत शासन अधिनियम 1935 है जिसकी धारा 213 में इस प्रकार के अधिकार का स्पष्ट रूप से उल्लेख था लेकिन इसका मूल स्रोत कनाडा का संविधान है। 


कब और किन विषयों पर मांग सकता है परामर्श?


भारतीय संविधान का अनुच्छेद 143 राष्ट्रपति को विधिक विषयों पर सर्वोच्च न्यायालय से यह परामर्श का अधिकार देता है । जिसके तहत राष्ट्रपति दो विषयों/  परिस्थितियों के उत्पन होने  परामर्श मांग सकता है ।


* राष्ट्रपति को यह प्रतीत हो जाए की किसी मामले में विधि या तथ्यों का कोई प्रश्न उत्पन्न हो गया है या उत्पन्न होने की संभावना भी है तो उस विषय पर परामर्श मांगा जा सकता है ।* संविधान लागू होनेे  याानि 26 जनवरी 1950 से पूर्व की विदेेशी सरकारो के साथ की गई संधि और समझौतों के बारे में परामर्श मांग सकता है ।


अनुच्छेद 143 (1)  यदि राष्ट्रपति को यह प्रतीत हो जाता है कि किसी विषय विशेष में विधि या तथ्यों का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हो गया है या फिर होने की संभावना भी हो तथा वह विषय सार्वजनिक महत्व का हो जिस पर सर्वोच्च न्यायालय का परामर्श लेना आवश्यक हो तो राष्ट्रपति उन विषयों पर परामर्श ले सकता है । राष्ट्रपति द्वारा मांगे गए परामर्श पर सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार प्राप्त है कि वह इस विषय पर अपनी राय/परामर्श दे सकता है और परामर्श देने के लिए मना भी कर सकता है । कहने का तात्पर्य  है कि सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रपति को परामर्श देने के लिए बाध्य नहीं है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति के लिये भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए परामर्श को मानना या उसे स्वीकार करना भी बाध्यकारी नहीं है ।


क्यों बाध्यकारी नही है ? सर्वोच्च न्यायालय के लिए परामर्श देना 


 विधिक विषयों पर राष्ट्रपति द्वारा मांगे गये परामर्श देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय बाध्यकारीता नहीं है । क्योंकि राय और परामर्श भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत प्रयुक्त विधि शब्द या विधि शब्द की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आती इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय पर बाध्यकारी नहीं है।


2  अनुच्छेद 143(2) सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगे जाने के बारे में एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह भी है कि 26 जनवरी 1950 से पूर्व विदेशी सरकारो के साथ की गई संधियों,समझोतो या करार आदि के बारे में या इस विषय मे किसी प्रकार का विवाद हो जिनको भारतीय संविधान के अनुच्छेद 131 के परंतु द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता में परिवर्तित किया गया है  । उन विषयों में राष्ट्रपति द्वारा मांगे गए परामर्श के बारे में सर्वोच्च न्यायालय के लिये परामर्श देने के लिए बाध्यकारीता है लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गई परामर्श को राष्ट्रपति स्वीकार करने के लिए बाध्यकारी नहीं है ।

क्या है परामर्श की प्रक्रिया ?

राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई राय/ सलाह /परामर्श पर न्यायालय की खंडपीठ उस पर सुनवाई करेगी और ऐसी सुनवाई के पश्चात्‌ जो वह ठीक समझती है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय/ सलाह/ परामर्श दे सकती है। आपको यह बता दे की किसी विषय विशेष तो मांगी गई सलाह पर कोई सलाह और परामर्श नहीं देना भी एक निर्णय हो सकता है।

अब तक कब और कितनी बार परामर्श मांगा गया?

 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने से लेकर वर्तमान समय तक राष्ट्रपति के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से 15 बार परामर्श मांगा जा चुका है । जिनकी संक्षिप्त जानकारी निम्न प्रकार से है ।


*   सन 1951 में पहली बार दिल्ली विधि अधिनियम 1912 की विधि मान्यता के बारे में सर्वोच्च न्यायालय से राष्ट्रपति द्वारा परामर्श मांगा गया था । 


*  सन 1958 में केरल शिक्षा विधेयक 1957 की संवैधानिकता का  प्रश्न उत्पन होने पर राष्ट्रपति द्वारा न्यायालय से परामर्श माँगा गया था ।

* 1960 मे बेरुबारी बनाम संघ के बारे में भारत-पाकिस्तान करार को लागू करने की प्रक्रिया के बारे में राष्ट्रपति के द्वारा परामर्श मांगा गया था ।


*  सन 1963 में समुद्री सीमा शुल्क अधिनियम 1963 में संशोधन की सवेधनिकता के संबंध में राष्ट्रपति के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगा गया था।


*  सन 1964 में उत्तर प्रदेश विधान मंडल के संबंध में कानूनी प्रश्न उत्पन होने पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगा गया था।


*  सन 1974 में राष्ट्रपति के निर्वाचन के दौरान गुजरात विधानसभा भंग थी । उस दौर में राष्ट्रपति के निर्वाचन हो सकते हैं या नहीं इस बारे में राष्ट्रपति के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगा गया था।


सन 1978 में  राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगा था कि आपातकाल के दौरान किए गए अपराधों की सुनवाई लिए विशेष न्यायालय की स्थापना  की जा सकती है या नहीं ।


*  सन 1982 में जम्मू और कश्मीर राज्य द्वारा बनाये गए पुनर्वास अधिनियम की मान्यता के बारे में राष्ट्रपति के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगा गया था। 

*  सन 1992 में राष्ट्रपति के द्वारा कावेरी जल विवाद प्राधिकरण के बारे में विधिक प्रश्न उत्पन्न होने पर  सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगा गया था।


सन 1993 में राम जन्मभूमि विवाद (राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद अथवा इस्माइल फारुकी बनाम भारत संघ) के बारे में परामर्श चाहा गया था कि क्या उस स्थान पर कोई मंदिर था या नही और उस विवादित भूमि को अर्जित करने के लिए अध्यादेश लाया जा सकता है या नही । जिसमे पांच सदस्यों की खंडपीठ ने सर्वसम्मति से अयोध्या विवाद पर राष्ट्रपति को अपनी सलाह देने से इनकार कर दिया था ।


*  सन 1998 में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका को लेकर राष्ट्रपति जी के द्वारा परामर्श चाहा गया था ।


*  सन 2001 में प्राकृतिक गैस और द्रवीभूत प्राकृतिक गैस विषय पर विधि निर्माण के  के बारे में राष्ट्रपति जी के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से राय मांगी गई थी।


*  सन 2002 में गुजरात विधानसभा भंग होने तथा नई विधानसभा का सत्र छः माह में होने के संबंध में राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगा गया था ।


  सन 2004 पंजाब विधान मंडल द्वारा पारित पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट अधिनियम 2004 के संबंध में परामर्श मांगा गया था ।


*  सन 2012 में 2G स्पेक्ट्रम के मामले में प्राकृतिक संसाधनों की नीलामी के बारे में राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगा गया था ।

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