सोशल  मीडिया बच्चों में टिक-टोक का क्रेज    आज सोशल मीडिया मानो  व्यक्ति  के जीवन का एक अनिवार्य  हिस्सा बन चुका है।  क्या बच्चे, क्या युवा,  क्या किशोर हर कोई  फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, यु ट्यूब,  टिक -टोक और ऐसे ही न जाने कितने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपने आप को सक्रिय रखते है ।यह भी सत्य है कि  कुछ सोशल मीडिया ऐप्प आज सामाजिक, राजनीति, ओर शैक्षणिक क्षेत्रों में सकारात्मक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने  में उपयोगी भी रहे है , वही कुछ ऐप्प ने समाज और युवाओं,किशोरों बच्चों पर दुष्प्रभाव भी डालते है ,।  कुछ ऐप्प नशा का रूप लेकर उनके मन मष्तिक पर छा रहे है । सोशल मीडिया के अपने -अपने फायदे और नुकसान हैं लेकिन जब  बच्चों के मन मष्तिस्क पर  सोशल मीडिया विशेषकर टिक टोक जैसा ऐप्प का क्रेज चढ़कर बोलने लगा  ऐसे में यह क्रेज एक बीमारी और समस्या का रूप ले लेता है  विशेषकर भारतीय परिवेश में तो यह ओर भी गंभीर ओर चिंतनीय विषय है । 


 क्या है ? टिक- टोक 
टिक -टॉक एक  लघु लिप-सिंक, कॉमेडी और प्रतिभा वीडियो बनाने और उसे शेयर करने के लिए एक  एंड्राइड सोशल मीडिया वीडियो ऐप है इस ऐप को  2017 में चीनी डेवलपर  बाइटडांस द्वारा चीन के बाहर के देशों के लिए लॉन्च किया गया था ।यह आज लगभग पूरे विश्व मे प्रयोग किये जाने वाला ऐप्प बन गया है । टिक टॉक के नाम से पहले यह ऐप्प musically  के नाम से जाना जाता था  2017 में  ByteDance  नामक चीनी कंपनी  जिसकी स्थापना  मार्च  2012 में स्थापित की गई थी इस कंपनी ने  खरीद लिया ओर टिक टॉक के नाम से नए रूप में शुरू किया।बच्चों और किशोरों में है भारी क्रेजभारत में बच्चे और किशोरों में  टिक-टोक  का भारी क्रेज  देखा गया है ।आज यह उनके मन मस्तिष्क पर इस कदर छा गया है की यह एक बीमारी का रूप ले चुका है । इस बीमारी से दुनिया में करीब एक अरब से ज्यादा और भारत में करीब 25 करोड़ लोग ग्रसित है. । देशी- विदेशी यूजर्स द्वारा मनोरंजन के नाम पर अवांछित सामग्री,द्विअर्थी शब्दावली का प्रयोग, फूहड़ मज़ाक आदि सामग्री परोसी जा रही है जिनका भारतीय समाज और संस्कति में कोई जगह नही है । इन सब का प्रभाव बच्चों के मन,मस्तिष्क ओर विचारधारा पर पड़ना स्वाभाविक है । यह मानसिक प्रदूषण से उन्हें दूषित करता है ओर दूसरी तरफ जब  बच्चा  अपनी पढ़ाई पर फोकस न कर जब टिक टोक में लगा रहेगा तो उसकी पढ़ाई भी प्रभावित होगी । दिलचस्प बात यह है कि आज टिक – टोक का इस्तेमाल करने वालो में गांवों और छोटे कस्बो, शहरों में लगातार बढ़ रही है और इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह भी है कि इसके इस्तेमाल करने वाले व्यक्तियो में विशेषकर 10 से 20 वर्ष के बच्चों व किशोरों  पर सर चढ़कर बोल रहा है । इसकी दीवानगी छा रही है।  टिक -टोक आज हमारे बच्चे और किशोरों  के मन  मष्तिक पर छाया हुआ है । कोई बच्चा , किशोर टिक- टोक पर वीडियो बनाने में  मशगूल है तो कोई टिक- टोक वीडियो देखने में खोया है । छोटे- छोटे बच्चों के हाथ से जब मोबाइल छीन लेते है तो रोने लगते है। इनसे अंदाज लगाया जा सकता है कि किस कदर टिक- टोक हमारे  बच्चों पर प्रभाव डाल रहा  हैटिक- टोक पर प्रतिबंध की पूरी कहानी ऐसे में टिक टॉक जैसे ऐप्प पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग उठती रही है । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आर्थिक और स्वदेशी जागरण मंच के द्वारा भी इसे प्रतिबंधित करने के लिए देश के प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मांग की थी। पिछले दिनों मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने भी  टिक टॉक जैसे ऐप्प पर प्रतिबंध लगाए जाने का आदेश सरकार को दिया था ओर गूगल ने 18 अप्रेल 2020 को  अपने स्टोर से  इसे हटा दिया  । इसके बाद टिक टोक ने कुछ  वीडियो को हटा भी  दिया था हालांकि अप्रेल के अंतिम सप्ताह में कोर्ट ने  अपने फैसले में ये  प्रतिबन्ध वापस  हटा लिया है लेकिन कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात को भी स्प्ष्ट किया कि वह बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है क्योकि साइबर  स्पेस में बच्चों की सुरक्षा के लिए COPAA ( चिल्ड्रन ऑनलाइन प्राइवेसी प्रोटेक्शन  जैसी  लेजिस्लेशन नही है । कारण जो कुछ भी हो लेकिन आज एक बार फिर  लॉक डाउन के दौर में सोशल मीडिया पर टिक -टॉक जैसे ऐप्प को प्रतिबंधित करने की मांग जोर पकड़ने लगी है  । ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसे एप्स जो भारतीय बच्चों के मन मस्तिष्क को प्रभावित कर हमारी संस्कृति और हमारे सामाजिक परिवेश को प्रभावित करता हो उसको लेकर सरकार गंभीर क्यों नहीं होती । जब जनता कोई आवाज उठाये या न्यायालय को आदेश देने पर ही सरकार की नींद खुलती है । आज आवश्यकता है एक कठोर गाइडलाइन ओर बच्चों की सुरक्षा के लिए अपने कानून में आवश्यक बदलाव बनाये जाने की ताकि ऐसे एप्स हमारे समाज ,हमारे किशोर ,बच्चों के मस्तिष्क पर घुसपैठ न कर सके ।  मद्रास हाई कोर्ट के निर्णय के पश्चात् कंपनी नेअपनी पॉलिसी ,नीतियों में काफी कुछ बदलाव को लेेकर  स्पष्ट किया है कि वह सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए अपने नीतियों  ओर  प्राइवेसी में बदलाव हेतु प्रतिबंध है ।यह कंपनी का स्वागत योग्य कदम ही होगा । अभिभावक समझे अपना दायित्वआज वैश्वीकरण ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  ओर अर्थ का  जमाना है हमें किसी से ज्यादा अपेक्षाये नही करनी चाहिये  हम अभिभावकों का भी दायित्व बनता है कि अगर हमें अपनी  किशोर  और बच्चों को अवांछित सामग्री से  जो बच्चों के मन मष्तिक को प्रभावित कर सकती है उनसे दूर रखना है, उनके मन मष्तिक को दूषित होने से बचाना है , उनका ध्यान भविष्य निर्माण में लगाना है तो हमें उन पर नजर रखनी होगी  ।बच्चा मोबाइल में कौनसा ऐप देख रहा है ,कहीं ऐसे किसी ऐप्प को लेकर उस पर  पागलपन तो सवार नही है  अगर आपको लगे  कि आपके बच्चे  ऐसे  ऐप्प या  बेव साइड को लेकर  कुछ ज्यादा ही  क्रेजी हौ  तो उसे  रोककर  उसे  समझाने का प्रयास करना चाहिए । किशोरावस्था  जोशीली और कुछ अलग कर गुजरने की अवस्था है वो  स्वतंत्रता चाहते हैं अपनी मर्जी से कार्य करना चाहते हैं ऐसे में  अभिभावकों  को विशेष तरीके से अपने बच्चों को समझाए जाने की आवश्यकता है  कि उनकी उम्र भविष्य निर्माण  और शिक्षा के लिए  है । हमे ऐसे ऐप्प से अपने  बच्चों को दूर रखना होगा ,उन्हें समझाना ओर जागरूक करना होगा । कैसे करे बचाव के उचित उपाय (1)  टिक टॉक पर यूजर्स के द्वारा पोस्ट किए गए वीडियो  को कंपनी के अप्रूवल के बाद ही अपलोड कंपलीट किया जाए ताकि कंपनी अपने मापदंड के आधार पर निर्धारित करें कि वह वीडियो उनकी नीतियों के अनुसार है या नहीं उसके पश्चात वे उसे अप्रूवल दे ।(2)  स्कूली पाठ्यक्रम में  साइबर क्राइम से जुड़ी हुई जानकारियों को शामिल कर बच्चों को अपने भविष्य के प्रति जागरूक किया जा सकता है ।(3)  विद्यालय परिवार का भी बच्चों पर प्रभाव पड़ता है उनका भी यह दायित्व बनता है कि आज के समय में साइबर क्राइम से संबंधित जानकारियां बच्चों को उपलब्ध कराएं ,बच्चों पर दुष्प्रभाव डालने वाले कार्यक्रमो, साइट, ओर ऐप्प से दूरी बनाई रखे जाने को प्रेरित करे। विभिन्न कार्यक्रमों, लेखन प्रतियोगिताओं, सेमिनार के माध्यम से जागरूक और सचेत रहने के लिए प्रेरित किया जाए ।(4)  बच्चों को अपने व्यक्तित्व के विकास में किन-किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए  उन्हें बताये की सोशल मीडिया से जुड़े कुछ अनावश्यक ऐप्प  ऒर साइड उनके भविष्य निर्माण और चरित्र निर्माण में बाधक बन सकते है ।इस सम्बन्ध में भी विधालय परिवार बच्चों में  जागरूकता पैदा करे ।

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