छूट गए हैं रोजगार और घर – बार  मदद की है आज उनको दरकार,
   “कहां तक मन को  ये अंधेरे छलेंगे उदासी भरे दिन कभी तो ढलेंगे  कभी सुख कभी दुख यही तो जिंदगी है  ये पतझड़ का मौसम घड़ी दो घड़ी है  उदासी भरे दिन कभी तो ढलेंगे ‘”आपके मन और मस्तिष्क में विचार आया होगा कि मैं आज उदासी भरे गाने क्यों गुनगुना रहा हूं मैं आज उदास होने की बात क्यों कर रहा हूं जी हां मैं आज उदास हूं उन मजदूरों दिहाड़ी मजदूरों श्रमिकों की उदासी देखकर मैं आज उदास हूं सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने वाले मजदूरों के पैरों में छाले देखकर मैं उदास हूं उस मासूम की छलकती आंखें देखकर मैं आज उदास हूं उन मजदूरों की भूख को देखकर जो दो वक्त की रोटी के लिए तरस गए हैं मैं आज उदास हूं बेबसों की उदासी देखकर जो रोज कमाते हैं रोज खाते हैं  में आज उदास हूं  सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक मजदूर का मार्मिक गाने को सुनकर लोक डाउनके दौरान मजदूरों को जिन जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा जिस दौर से गुजरना पड़ा उनको शब्दों में बंधना आसान नहीं है ।




कौन है लॉक डाउन से अधिक पीड़ित
संकट के इस दौर में लॉक डाउन की मायूसी हर व्यक्ति हर वर्ग हर तबके के चेहरे पर झलकती दिखाई देती है प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कम या ज्यादा समाज का हर व्यक्ति इससे प्रभावित है लेकिन अगर सबसे अधिक प्रभावित हुआ है सबसे अधिक मायूस हुआ है तो वह है देश का श्रमिक मजदूर दिहाड़ी मजदूर रोज कमा कर खाने वाला व्यक्ति जिसका एक तरफ तो रोजगार छिन गया है दूसरी तरफ रोजी रोटी का पेट भरने का संकट उत्पन्न हो गया है किसी को अपनी रोजी रोटी की चिंता सता रही है तो किसी को अपने रोजगार की किसी को अपने घर अपनों के पास पहुंचने की चिंता है तो किसी को अपनो से बिछड़ने की ।
संकट के इस दौर में लॉक डाउन की मायूसी हर व्यक्ति हर वर्ग हर तबके के चेहरे पर झलकती दिखाई देती है प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कम या ज्यादा समाज का हर व्यक्ति इससे प्रभावित है लेकिन अगर सबसे अधिक प्रभावित हुआ है सबसे अधिक मायूस हुआ है तो वह है देश का श्रमिक मजदूर दिहाड़ी मजदूर रोज कमा कर खाने वाला व्यक्ति जिसका एक तरफ तो रोजगार छिन गया है दूसरी तरफ रोजी रोटी का पेट भरने का संकट उत्पन्न हो गया है किसी को अपनी रोजी रोटी की चिंता सता रही है तो किसी को अपने रोजगार की किसी को अपने घर अपनों के पास पहुंचने की चिंता है तो किसी को अपनो से बिछड़ने की ।
मजदूर के मन के भावपिछले दिनों  ऐसे ही एक मजदूर और श्रमिक भाई ने अपनी पीड़ा अपने एहसास को एक गाने के माध्यम से देश की जनता को सुनाया और वह वीडियो वह गाना सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है वह गाना सुन कर मैं उदास हुआ
“हम मजदूरों को  गांव हमारे भेज दो सरकार
सूना पड़ा है हमारा घर द्वार…..
मजबूरी में हम सब मजदूरी करते हैं
घर बार छोड़ कर हम शहरों में भटकते हैं
जो लेकर आए थे हमें वह छोड़ गए मझदार
कुछ तो करो सरकार …….
हम मजदूरों को गांव हमारे भेज दो सरकार
सूना पड़ा है हमारा घर द्वार ….
हमको पता  न था कि ये दिन भी आएंगे
कोरोना कारण घरों में सब छुप जाएंगे
हम तो बस पापी पेट के कारण झेल है यह मार
कुछ तो करो सरकार …..
सुना पड़ा है हमारा घर द्वार
हम मजदूरों को गांव  हमारे भेज दो सरकार।।
 सूना पड़ा है हमारा घर द्वार….”

      इस गाने के एक-एक शब्द उस गाने के एक-एक बोल उस आम आदमी श्रमिक मजदूर की पीड़ा का एहसास करा रहा है उसके दुख हो और पीड़ा की दास्तान को बयान कर रहा है गाने के बोल को शब्दों को कलम के माध्यम से मैं आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं और यह पूरा दावा करता हूं कि गाने के बोल और एक-एक शब्द को पढ़कर सुनकर आपके भी मन मस्तिष्क में उदासी  झलकेगी ओर उदासी के बोल मुख से निकल पड़ेंगे आप भी शायद एहसास कर पाओगे उसकी पीड़ा को ओर जाग उठेगी आपकी भी संवेदना….. जहां भी आपको ऐसे मजदूर भाई मिले दिल खोल कर उनका सहयोग करें उन्हें भोजन कराएं उन्हें आवश्यक सामग्री उपलब्ध करवाएं और हो सके तो उन्हें अपने घर तक पहुंचाने में उनकी मदद करें…। लॉक डाउन मानव जाति और देश पर आए हुए इस संकट के समाधान के लिए आज की आवश्यकता भी है हमें मिलकर इस समस्या का समाधान ओर सामना  करना है साथ ही जरूरतमंदों को मदद के लिए हमें हाथ भी बढ़ाना है तभी हमारा मजदूर भाई कह पाएगा ” दिन अस्त और मस्त मस्त “

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