गुनहगार हो गए टीजीटी 2012 वाले शिक्षित बेरोजगार अधिक अंक लाकर 


 पिछली कांग्रेस सरकार के द्वारा पंचायती राज विभाग के माध्यम से तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती 2012 की गई थी वह भी क्या माजरा था अलग-अलग जिलों में अलग-अलग पेपर भर्ती परीक्षा के बाद तरह-तरह की चर्चाएं सामने आई है सवालों के सही जवाब को गलत मान लिया गया और गलत को सही मामला इतना उलझा किए भर्ती न्यायालय में चली गई और न्यायालय के आदेश से बार-बार रिवाइज रिजल्ट जारी हुआ । सरकारे बदली भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी लेकिन तब भी उनके साथ न्याय नहीं हो पाया।

अंतिम बार रिवाइज रिजल्ट जारी होने के बाद करीब 6000 विद्यार्थी जो कि टीजीटी 2012 के तहत अध्यापक पद पर नियुक्ति पा चुके थे को बाहर होने का आदेश हुआ लेकिन इस सरकार की दरियादिल्ली थी कि उनको समायोजित कर दिया । उनको स्थाई कर दिया। माजरा तो देखिए लगभग 3000 आउटर्स को उन पदों पर समायोजित किया गया जो पद टीजीटी 2012 के तहत किसी भी प्रकार के रिक्त हो गये थे।। वह पद तो अधिक अंकधारियों का हक था बाकी रहे करीब 3000 आउटर्स को शिक्षा विभाग से पद लेकर पदों पर समायोजित आदेश जारी हुआ और भी कर दिया और धक्के खा रहे हैं अधिक अंकधारी युवा बेरोजगार गरीब किसान और मध्यम वर्ग के बेरोजगार।

 लोग अपने खून पसीने की कमाई से अपने बच्चों और और अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपने बच्चों को पढ़ाते हैं और जब तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती 2012 जैसे घोटाले होते हैं तो ऐसे बेरोजगारों और उनके परिवारों पर जो कि सपने सजाए बैठे हैं कुछ करने के लिए…. उन पर पानी फेर दिया जाता है । क्या गुनाह है उन अधिक अंक वाले बेरोजगार युवाओं का जो पिछले 9 वर्षों से दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो रहे हैं । क्या उनका यह गुनाह था कि उन्होंने पढ़ लिख कर अधिक अंक प्राप्त किए । गलतियां थी गुन्हेगार थे तो सरकारी नुमाइंदे और सरकारी विभाग सरकारी मशीनरी । उन्हीं की गलतियों की वजह से तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती 2012 वालों को यह दिन देखने को पड़ रहा है लेकिन भुगतना पड़ रहा है बेरोजगार युवाओं को ।

एक कैसी न्याय प्रणाली है यह कैसा प्रशासन है । सरकार की यह कैसी नैतिकता है यह केसी सरकार की कार्यप्रणाली है कि कम अंकों वाले व्यक्तियों को तो समायोजित करके उनको पुरस्कृत कर दिया जबकि गलतियां सरकार की थी और अधिक अंक वाले युवा बेरोजगार पिछले 9 वर्षों से अपने अधिकारों के लिए दर-दर की ठोकरे खा रहे हैं । 


कभी राजस्थान उच्च न्यायालय तो कभी सर्वोच्च न्यायालय में अपने अधिकारों की बात करते हैं ओर न्यायलय के दर पर बजाते है लेकिन यह सरकार उनके सपनों को कुचलने के लिए राजस्थान उच्च न्यायालय की सिंगल बेंच कभी ,डबल बेंच के आदेश को भी दरकिनार कर अपनी हठधर्मिता को पूरा करने के लिए बेरोजगार युवाओं और उनके मजबूर परिवारों के सपनों को कुचलती है। सरकार। अपनी गलतियां छुपाने के लिए अपनी कार्यप्रणाली पर पर्दा डालने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी दायर कर देते हैं फिर कहते हैं बेरोजगार के हितों वाली सरकार, अरे कौन से हितों को पूरा कर रहे हो आप ? कौन से सपनों को पूरा कर रहे हो आप? कुचल रहे हो गरीब किसान और मध्यम वर्ग के सपनों को । 


आख़िर क्या गुनाह था बेरोजगारों का 


क्या यह उनका गुनाह था कि पढ़ लिखकर अधिक अंक प्राप्त किए आज भी युवा न केवल मानसिक रूप से बल्कि आर्थिक रूप से भी पीड़ा झेल रहा है। गरीब किसान का बेटा जो मेहनत मजदूरी करता है जिसके माता-पिता दिहाड़ी मजदूर करते हैं अपनी कमाई के पैसों से अपने अधिकारों के लिए न्यायालय की लड़ाई लड़ने को मजबूर हो रहे हैं और फिर भी सरकारी बात करती हैल। बेरोजगारों की हितों की कौन सा हित पूर्ति कर रहे हैं आप ? सताया जा रहा है बेरोजगारों को उनको , उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है । बेरोजगारों को उनके सपनों को कुचला जा रहा है। 


बेरोजगार आर्थिक और मानसिक रूप से हुये परेशान 


बेरोजगारों के उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से पीड़ित किया जा रहा है। आज जो युवा अधिक अंक प्राप्त करने के बाद भी पिछले 9 वर्षों से नियुक्ति की मांग को लेकर दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो रहे हैं उनके लिए सिर्फ और सिर्फ सरकारी मशीनरी और सरकारी नुमाइंदे जिम्मेदार है ।

जब कम अंकों वालों को समायोजित करने के लिए नए नए कानून बनाए जा सकते हैं कानूनों को लचीला किया जा सकता है तो फिर अधिक अंक वालों के हितों पर कुठाराघात क्यों? इसके लिए केवल और केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। केवल और केवल उनकी हठधर्मिता है। सैकड़ों बार सरकारी नुमाइंदों जनप्रतिनिधियों की दहलीज पर जाकर उनसे अपील की गई हर बार मिला तो केवल झूठा आश्वासन। उन्हें बहला फुसलाया गया ,उनके धरने प्रदर्शन को हटाया गया ,लेकिन आज भी वही के वही है बेरोजगार। क्या कहेंगे अब आप और क्या कहने को बाकी बचा है ,। 


कौन है इस हालात के जिम्मेदार

आखिर कौन है इन सब के लिए जिम्मेदार ? क्या अधिक अंक लाकर अपने हक की मांग करने के लिए मजबूर हो रहे युवा गुन्हेगार है ? क्या उनके घर वाले जिम्मेदार है जो अपने बच्चों को पढ़ा कर सपने संजोके बैठे है ? या सरकारी मशीनरी और सरकारी नुमाइंदे और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है? सरकार की कथनी और करनी में अंतर है बेरोजगारों के हितों की बात करते हैं अपने दिल के किसी कोने में झांक कर देखिए क्या आपका यह कार्य आप की कथनी और करनी के अनुसार है ?क्या आपके यह कार्य बेरोजगारों के हितों पर कुठाराघात नहीं है ? अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो पिछले 8 वर्षों से दर-दर की ठोकरें खा रहे बेरोजगार युवाओं को अति शीघ्र नियुक्ति दी जा सकती है आवश्यकता है तो केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की ।

देखते हैं कितनी राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाती है सरकार ? कितने सपने को साकार करती है यह सरकार ? कितनी बेरोजगार हितों की बात करने वाली सरकार अपने वादों पर खरी उतरती है? अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो कानून कायदे कहीं उनकी नियुक्ति में बाधक नजर नहीं आते । सरकार ने टीजीटी 2012 में रिक्त पदों पर आवटर्स को समायोजित कर दिया। शेष रहे पदों पर शिक्षा विभाग से पद लेकर समायोजित किया गया सोचने वाली बात तो यह है कि जब शिक्षा विभाग से पद लेकर उन 3000 आउटर्स को समायोजित किया जा सकता है तो आज के दौर में अधिक अंकधारी युवा बेरोजगार जो पिछले 9 वर्षों से नियुक्ति की मांग को लेकर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं आज फिर एक बार राजस्थान में कांग्रेस सरकार है तो उनको समायोजित क्यों नहीं किया जा सकता ? उन्हें अपॉइंटमेंट क्यों नहीं दिया जा सकता है?


 यह तो स्पष्ट नजर आ रहा है कि न तो सरकार को टीजीटी 2012 में अधिक अंकधारी बेरोजगार युवाओं की चिंता है । ना उनके भविष्य की चिंता है। और इन सब के लिए जिम्मेदार राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी होना है अपनी हठधर्मिता पर अड़े रहना है। तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती 2012 से जुड़ा हुआ एक मार्मिक पहलू है जिसे केवल और केवल एहसास किया जा सकता है और वह एहसास वही लोग कर सकते हैं जो पिछले 9 वर्षों से इस भर्ती से जुड़े रहकर सर्वोच्च न्यायालय तक संघर्ष कर रहे हैं उनका दिन होता है तो तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती 2012 से जुड़े हुए मुद्दों पर सोच विचार करने से अगर उनके दिन का अंत होता है तो तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती 2012 के बारे में सोचते सोचते।


कम अंक वालों को तो समायोजित कर किया गया पुरस्कृत अधिक अंक वाले खा रहे हैं दर-दर की ठोकरें आखिर जिम्मेदार कौन ….. गलती सरकारी मशीनरी की भुगत रहे हैं बेरोजगार इन सब के लिये जिम्मेदार है तो केवल और केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी होना ।
 भर्ती आयोजित हुई थी कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में सरकार बदली भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी और आज फिर कांग्रेस सरकार है लेकिन बेरोजगार आज भी पीड़ित है किसी ने उनके साथ न्याय नहीं किया याचिकाकर्ताओं को नियुक्ति दे सरकार तभी होगा इस भर्ती का बेड़ा पार
 गुरु जी पढ़ाया करते थे “सत्य परेशान हो सकता है पराजित नही” बस इसी उम्मीद पर है कि न्यायालय न्याय कारेगा 

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