मदर्स डे( मातृ दिवस)  :- जीवन में हर दिन मातृ दिवस होने की सोच विकसित करनी होगी।

       दुनिया का सबसे छोटा शब्द और जिसका सबसे बड़ा अर्थ  जिसमे पूरा संसार समाया है जिसको शब्दों में बांधना  न तो संभव है और ना मेरी कलम में इतनी तासीर है कि में उस शब्द पर कुछ लिख सकु । वह दुनिया का सबसे प्यारा शब्द है ” मां ”   इस शब्द और माँ के बारे में क्या कहूँ  बस माँ तो माँ है – मां भावना है,  संवेदना है , मां प्रेम है मां कशिश है प्रेम है,  माँ त्याग है तपस्या है , माँ अर्पण है  समर्पण है प्यार की थप्पी है , माँ ममता की मूरत है ,  माँ एहसास है मां पूजा है माँ  सृष्टि है तभी तो भगवान गणेश ने अपने माता-पिता की  परिक्रमा कर के सृष्टि की परिक्रमा मान ली थी । मां पृथ्वी है, जगत है, धुरी है,मां के बिना इस सृष्टि की कल्पना अधूरी है ।

माँ के बिना न तो महात्मा है ना परमात्मा है क्योंकि इनका अस्तित्व की मां पर टिका है । मां तो मां है मां विष्णु,माँ  अल्लाह है मां ईश्वर है मां वाहेगुरु है । मान्यताओं के अनुसार उस परमपिता परमेश्वर ब्रह्मा जी /अलाह/खुदा/ने सृष्टि  को बनाया है संसार  का निर्माण किया है मैं इस मत और मान्यताओं को नकार तो नहीं हूं सम्मान करता हूं मैं धर्म और अध्यात्म का पर सच पूछो तुम मुझे मेरी मां ने बनाया है ।  चाहे महात्मा हो या परमात्मा हो या ।ईश्वर हो या अल्लाह हो उनको भी किसी मां ने बनाया होगा  धर्म में भी मां का दर्जा ईश्वर से ऊपर माना जाता है ।

  यह शाश्वत सत्य हैं कि दुनिया में शब्द ज्ञान के लिए स्कूल, कॉलेज में पढ़ना पड़ता है ज्ञान लेना पड़ता है ,अध्ययन करना पड़ता है, पढ़ाई करनी पड़ती है लेकिन यहीं  मां शब्द ऐसा है जिसे सीखने के लिए किसी विश्वविद्यालय, किसी भी स्कूल/ कॉलेज  में अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है बल्कि जन्म से ही  हर बच्चा पहला शब्द मां ही बोलता है  पहला गुरु अगर होता है तो मां होती  ।इससे मां और मां शब्द का महत्व खुद ब खुद बयां हो जाता है । 

आज के भौतिकवादी युग में न किसी के पास वक्त है मैं किसी के पास अपनों के लिए संवेदना है । बस खुद के लिए जिए जा रहे हैं   एकांकी परिवार की बढ़ती हुई संस्कृति , घटते हुए मूल्य घर में बड़े बुजुर्गों और मां की संवेदना के साथ खिलवाड़  ,उंसको   वृद्ध आश्रम में छोड़ दिया जाता है  । उन पर अत्याचार किया जाता है  उनकी मूलभूत आवश्यकताओं को भी ध्यान में नहीं रखा जाता । ऐसे ही  मार्मिक घटनाये   आज पढ़ते सुनते और मीडिया में देखने को मिलती है । आज जिस मुकाम पर और सफलता की ऊंचाई पर हम है हम भूल जाते हैं कि उस ऊंचाई के लिए मां ने कितनी कुर्बानियां दी होगी । हमें सूखे में सुलाने के लिए उसने कितनी रातें जिले में गुजारी होगी । हमारा पेट भरने के लिए न जाने कितनी बार मां भूखी सोई होगी । बागवान फिल्म आज के समाज के कड़वे सत्य को दर्शाती है ।

क्यों औऱ कब मनाया जाता है 

 इस भागदौड़ की जिंदगी में युवा पीढ़ी को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराने जागरूक करने, बच्चे अपनी मां से अपनी जिंदगी में उनकी क्या जगह है इस बात को बताने के लिए  विश्व के अलग-अलग देशों में अलग-अलग दिन मदर्स डे के रूप में मनाए जाने की परंपरा ही रही है इसे मनाए जाने की पीछे की अनेक कहानियां किस्से प्रचलित है ।

ऐसा माना जाता है कि वर्ष 1914 में अमेरिकी राष्ट्रपति ने मई के माह के   दूसरी रविवार को मातृ दिवस (मदर्स डे )  के रूप में मनाये जाने की घोषणा की थी तब से भारत  , अमेरिका सहित कई देशों में इसे मनाया जाने लगा और अमेरिका जैसे देशों में मई माह के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाए जाने की परंपरा रही है । 

 घर मे माँ दु:खी तो ईश्वर खुश कैसे भोगा 

 यह साश्वत सत्य हैं औऱ याद रखिए मां के बिना आपका हमारा कोई अस्तित्व नहीं है । चाहे जितने देवी देवताओं, भगवान, अल्लाह ,ईश्वर की पूजा करो अगर घर में मां की आंखों में आंसू है ,मां कुछ कहने से डरती हो, मां खाँसने और छिकने से डरती हो, मां कुछ बोलने से डरती हो, मां के द्वारा  टोका टोकी आपको  नहीं लगती हो, जब मां की उपस्थिति आपको अपनी स्वतंत्रता में बाधा लगती हो , वह ऊपर वाला आपसे कभी खुश हो ही नहीं सकता क्योंकि जिसके आगे खुद भगवान झुकता है  ।उस मां को जब पीड़ा दी जाती हो उसकी संवेदनाओं को कुचला जाये  तो ऐसी कल्पना आपको  करनी भी नहीं  चाहिये कि ईश्वर आपसे  खुश होगा ।

बच्चों को वातावरण दे….

बच्चों के पालन पोषण में एक ऐसा वातावरण दिया जाए जिनमें वह अपने माता-पिता बड़े बुजुर्गों का सम्मान करना सीखें ।सनातन संस्कृति का उन्हें परिचय कराएं । प्रातः कालीन अभिवादन की परंपरा का विकास करें । परिवार के बड़े सदस्य अगर इस प्रकार का वातावरण बच्चों को देंगे निश्चित रूप से बच्चे उसका अनुसरण करेंगे ।

संवेदनहीनता को परंपरा बनने से रोकना होगा

 समाज में हो रही ऐसी संवेदनहीन घटनाओं को एक परंपरा बनाए जाने से रोकना होगा । हमें अपने बच्चों के समाजीकरण में ऐसे संस्कार, ऐसी शिक्षा देनी होगी कि वह मां और मां शब्द के अर्थ को समझें ,उसके महत्व को समझे नहीं तो बच्चे वही करेंगे जो आज देख रहे हैं । आज किसी और कोई पीड़ा और उपेक्षा भुगतनी पड़ रही हो तो कल आपको भी उसी पीड़ा से गुजरना पड़ सकता है । सनातन संस्कृति और सभ्यता का मैं तो समझते हुए मां की उपेक्षा उसके साथ अमानवीय व्यवहार को परंपरा बनने से रोकना होगा ।

हर दिन हो मातृ दिवस 

हालांकि  ऐसे दिवस मनाए जाने से  प्रेरणा  मिलती भी  लेकिन वर्ष में केवल एक  दिन  मातृ दिवस मना कर अपनी फोटो खिंचवा कर , कविताओं की रचना कर के , फिल्मी गानों का वायरल कर , माँ को एक दिन गिफ़्ट  देकर, कुछ सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर डालने से ही इस दिवस का उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता । हमें हर रोज मातृ दिवस मानते हुए इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा तभी मातृ दिवस मनाया जाना सार्थक हो सकता है ।

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