प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल के दौरान 111 वां संविधान संशोधन विधेयक 2011 संसद में प्रस्तुत किया गया था और यह संविधान संशोधन विधेयक 97 वां संविधान संशोधन अधिनियम 2011के रूप में  दिसम्बर 2011 को संसद में पारित होने के बाद फरवरी 2012 में यह लागू हुआ था ।  इस संविधान संशोधन के द्वारा संविधान में कुछ नए अनुच्छेद और नए भाग जोड़े गए  नया मंत्रालय का गठन कर इसे लागू भी कर दिया गया । 

पिछले दिनों अचानक यह संविधान संशोधन एक चर्चा का विषय बना कारण यह है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस संविधान संशोधन से संबंधित कुछ प्रावधानों को अपने द्वारा 20 जुलाई 2021 को दिए गए फैसले में रद्द कर दिया

  • क्या है प्रावधान है इस संशोधन मे

संसद के द्वारा  दिसंबर 2011 में देश में सहकारी समितियों को प्रभावी बनाने से सम्बंधित 111 वां संविधान संशोधन विधेयक 2011 के रूप में एक विधेयक संसद में रखा  । यह विधेयक 97 वे संविधान संशोधन अधिनियम के रूप में दिसंबर 2011 में  पारित हुआ था ।  यह संशोधन विधेयक 15 फरवरी, 2012 से लागू हुआ था। 

  • सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा

इस संविधान संशोधन के तहत सहकारिता को संरक्षण देने के लिए  संविधान के भाग 3 में मूल अधिकारो के अंतर्गत अनुच्छेद 19(1)(c) में संशोधन किया गया  तथा भाग 4 में नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 43 B और भाग 9 B जोड़ सहकारी संस्थाओं को सवैधानिक दर्जा दिया गया । 

ध्यातव्य – मंत्रालय का भी किया गठन- इस संविधान संशोधन के द्वारा भारत सरकार में एक नया मंत्रालय जोड़ा गया जिसका नाम है सरकारीता मंत्रालय ।

  • संशोधन को गुजरात हाई कोर्ट में चुनोती

सहकारिता से सम्बंधित प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिये किये गए इस संविधान संशोधन को भारत संघ बनाम राजेन्द्र शाह वाद के माध्यम से 2013 में गुजरात उच्च न्यायालय में चुनोती दी गई । गुजरात हाई कोर्ट ने अपने  निर्णय में कहा कि सहकारी समितियों के संबंध में संसद कानून नहीं बना सकती क्योंकि यह राज्य सूची का विषय है। इस आधार पर इस संविधान संशोधन की उस सीमा तक रद्द कर दिया जहां तक यह संविधान का उल्लंघन करता हैं । 

  • केन्द्र ने HC  के फैसले को SC में दी थी चुनोती

गुजरात उच्च न्यायालय के द्वारा 22 अप्रेल 2013 को दिए गए फैसले के खिलाफ केंद्र ने 2013 में 97वें संविधान संशोधन के कुछ प्रावधानों को निष्प्रभावी करने के गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी। गुजरात  हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि सहकारी समितियों के संबंध में संसद कानून नहीं बना सकती क्योंकि यह राज्य सूची का विषय है।

सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा पिछले दिनों इस मामले की सुनवाई की थी लेकिन फैसला सुरक्षित रख लिया था । अब 20 जुलाई 2021 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया है। 

  • 97 वे संविधान संशोधन को चुनोती क्यों ?

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान सहकारी समितियों को प्रभावी बनाने के लिए जो 97 वां संविधान संशोधन किया गया उसको चुनौती दिए जाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि सहकारिता का विशेष राज्य सूची का विषय है जिस पर कानून निर्माण का अधिकार केवल राज्यों को है।
सहकारिता विषय संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत राज्य सूची का विषय है जिस पर कानून निर्माण का अधिकार राज्य विधान मंडलों को है  ।

यह शक्ति विभाजन की व्यवस्था का उल्लंघन है ।संविधान के अनुच्छेद 252 के तहत उपलब्ध है । दो या दो से अधिक राज्य ऐसी मांग करे तो उनकी सहमति से कानून बनाने की संसद की शक्ति से संबंधित है।

अनुच्छेद 368(2) के प्रावधान के अंतर्गत राज्यों से संबंधित विषयों में संशोधन किए जाने के लिए कम से कम आधे राज्यों की सहमति आवश्यक होती है जो कि केंद्र सरकार ने नहीं ली।  अतः  केन्द्र ने संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन किया है ।

* अनुच्छेद 249 उपबंध है कि राज्यसभा अपने बहुमत से राज्य सूची के किसी भी विषय को राष्ट्रीय महत्व का विषय घोषित कर सकती है । लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ नही किया गया ।

  • अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने रखा सरकार का पक्ष

उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपनी अपील में अटॉर्नी जनरल के.के .वेणुगोपाल द्वारा केंद्र सरकार की ओर से पैरवी करते हुये दो मुख्य तर्क रखे। उन्होंने कहा कि संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति सातवीं अनुसूची के साथ पढ़े गए अनुच्छेद 246 के अनुसार विधायी प्रविष्टियों के आवंटन से सीमित नहीं है। संसद की सवैधानिक शक्ति उसकी विधायी शक्ति से भिन्न होती है। वेणुगोपाल ने कहा कि अनुच्छेद 368 संशोधन की प्रक्रिया बताता है और इससे अलग होना मूल संरचना का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।

  • सर्वोच्च न्यायालय ने दिया अपना फैसला

देश की शीर्ष अदालत  ने  20 जुलाई 2021(मंगलवार ) को 1: 2 के बहुमत से अपना फैसला सुनाते हुए सहकारी समितियों के प्रभावी प्रबंधन संबंधी मामलों का समाधान करने वाले संविधान के 97वें संशोधन की वैधता बरकरार रखी हैं लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि न्यायालय ने इस संविधान संशोधन द्वारा जोड़े गए उस हिस्से को रद्द किया है, जो संविधान एवं सहकारी समितियों के कामकाज से संबंधित है। 

न्यायमूर्ति आर. एफ. नरीमन, न्यायमूर्ति के.एम. जोसफ और न्यायमूर्ति बी. आर. गवई की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘हमने सहकारी समितियों से संबंधित संविधान के भाग 9 B को हटा दिया है, लेकिन हमने इस संशोधन को बचा लिया है।’

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया है उसने पूरे 97 वे संविधान संशोधन को रद्द नहीं किया गया है बल्कि इस संविधान संशोधन के द्वारा जोड़े गए भाग 9 B को हटाया गया है। कहने का तात्पर्य इस संशोधन को आंशिक रूप से रद्द क्या है। 

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