constitution and government · October 2, 2021 0

संभागीय प्रशासन और उसका संगठनात्मक ढांचा क्या है ? संभागीय आयुक्त के पद का सृजन कब हुआ ?

राजस्थान में प्रशासनिक व्यवस्था

आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में शासन और प्रशासन को सुव्यवस्थित संचालन करने तथा राजनीतिक मुखिया को नीति निर्माण व योजना निर्माण में सहयोग और सहायता देने तथा सरकारी नीतियों को आम जनता तक पहुंचाने,उनकी मॉनिटरिंग करने, उन्हें लागू करने के लिए सभी स्तरों जैसे सचिवालय प्रशासन ,संभाग प्रशासनिक, जिला प्रशासन, उपखंड प्रशासन, तहसील प्रशासन,पंचायत प्रशासन पर एक प्रशासनिक ढांचा होता है । 

राजस्थान राज्य की प्रशासनिक व्यवस्थाओं को मध्य नजर रखते हुए सचिवालय और जिला मुख्यालय के बीच आपसी तालमेल और समन्वय बनाए रखने के लिए संभाग व्यवस्था का प्रावधान किया इसमें कई जिलों को मिलाकर एक संभाग मुख्यालय निर्मित किया जाता है। 

  • भारत में संभागीय व्यवस्था का इतिहास 

भारत में संभागीय प्रशासन संभागीय आयुक्त के पद का सृजन सर्वप्रथम सन 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिक के कार्यकाल में जिला कलेक्टर पर निगरानी रखने उसके कार्यों पर नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण बटने के उद्देश्य से किया गया था।

अंग्रेज सरकार के द्वारा 1907 रोयल कमीशन तथा सन् 1927 में नियुक्त  साइमन कमीशन/श्वेत कमीशन जो कि फरवरी 1928 में भारत आया था इसने भी आयुक्त प्रणाली/कमिश्नर प्रणाली का समर्थन किया था।

  • राजस्थान में संभागीय व्यवस्था 

राजस्थान में सर्वप्रथम तत्कालीन मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री के द्वारा ससचिवालय और जिला प्रशासन के बीच आपसी तालमेल और समन्वय बनाए रखने और जिला मुख्यालयों पर निगरानी रखने के उद्देश्य से 1949 में राजस्थान के 25 जिलों को 5 ( जयपुर,जोधपुर, बीकानेर,उदयपुर और कोटा ) संभागों में  विभाजित करने के साथ ही संभागीय प्रणाली को शुरू की गई थी । 

1 नवंबर 1956 को राजस्थान का एकीकरण पूर्ण होने के साथ जब अजमेर-मेरवाड़ा राजस्थान में शामिल हुआ तब अजमेर को राजस्थान का छठवे क्रम का जिला बनाया गया था । इस समय अजमेर जयपुर संभाग के अधीन आता था।

  • संभागीय व्यवस्था के औचित्य पर सवाल 

राजस्थान में संभागीय व्यवस्था के औचित्य पर सवाल उत्पन्न होने और इस पद को अनुपयुक्त मानते हुए अप्रैल 1962 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया के द्वारा संभागीय व्यवस्था को समाप्त कर दिया ।

  • संभागीय व्यवस्था को पुनर्जीवित किया गया 

एक बार फिर से संभागीय व्यवस्था  की आवश्यकता महसूस होने पर सन 1987 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी के द्वारा 26 जनवरी 1987 को संभागीय व्यवस्था को पुनर्जीवित किया और अजमेर को नया संभाग बनाया गया । इस प्रकार अब पांच की जगह राजस्थान में 6 संभाग हो गए ,जयपुर, जोधपुर,उदयपुर, बीकानेर, कोटा और अजमेर । ज्ञात हो कि अब तक का नवीनतम और सबसे बाद में बनाया गया संभाग भरतपुर संभाग है जो कि सन 2005 में बनाया गया था। वर्तमान समय में राजस्थान में 7 संभाग है।

  • संभागीय प्रशासनिक ढांचा

सामान्यतया संभाग स्तर पर कोई कार्यात्मक दायित्व नहीं होते है। केवल जिला प्रशासन पर नियंत्रण और उसका पर्यवेक्षण करना ही संभागीय आयुक्त के कार्यालय का मुख्य कार्य और दायित्व होता है। 

संभागीय प्रशासनिक ढांचा संगठन

संभागीय कार्यालय में कर्मचारियों संख्या तो निश्चित नही होती है लेकिन करीब  40 से 50 की संख्या में कर्मचारी हो सकते हैं । 

राजस्थान के संदर्भ में देखा जाए तो संभागीय आयुक्त और उनके अधीनस्थ अतिरिक्त संभागीय आयुक्त, उप निदेशक, राजस्व लेखा निरीक्षक और राजस्व सांख्यिकी एवं सामान्य प्रशासनिक कार्मिक के पद होते है। 

संभागीय आयुक्त की सहायता के लिए एक अतिरिक्त संभागीय आयुक्त होता है जो कि समान्यतया  संबंधित राज्य सेवा का प्रशासनिक अधिकारी होता है ।

इसके अलावा संभागीय आयुक्त के कार्यालय में राजस्व और सांख्यकीय से संबंधित अधिकारी भी होते हैं।  जिनकी नियुक्ति विभिन्न संबंधित विभागों से प्रतिनियुक्ति पर की जाती हैं।

  • संभागीय आयुक्त का पद

राज्य सचिवालय और जिला मुख्यालय के बीच आपसी तालमेल और समन्वय बनाए रखने वाले प्रशासनिक तंत्र का मुखिया संभागीय आयुक्त होता है जो कि भारतीय प्रशासनिक सेवा का एक वरिष्ठ सदस्य होता है।

संघ लोक सेवा आयोग के द्वारा आयोजित परीक्षा में सफलता के पश्चात विभिन्न उच्च प्रशासनिक पदों पर कार्यानुभव प्राप्त करने के पश्चात वरिष्ठता के आधार पर संभागीय आयुक्त के पद पर नियुक्त किया जाता है।इन पद की सेवा शर्ते हैं और वेतन का निर्धारण भारत सरकार के नियमानुसार निर्धारित किया जाता है।

  • अतिरिक्त संभागीय आयुक्त

संभागीय आयुक्त की सहायता के लिए एक अतिरिक्त संभागीय आयुक्त होता है जो कि समान्यतया  संबंधित राज्य सेवा का प्रशासनिक अधिकारी होता है ।

  • संभागीय आयुक्त के कार्य 

संभागीय आयुक्त संभाग स्तर पर प्रशासनिक तंत्र का मुखिया होता है । एक संभागीय आयुक्त को एक संभाग के राजस्व और विकास प्रशासन के पर्यवेक्षण की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी दी जाती है। उसके कार्य को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है। 

सचिवालय और जिला प्रशासन के बीच समन्वय बनाए रखना।

० संभाग स्तरीय प्रशासनिक व्यवस्था का पर्यवेक्षण करना।

० संभाग स्तर के प्रशासनिक कार्यों का संपादन करना। 

० जिला प्रशासन पर नियंत्रण और उनका निर्देशन करना।

० राजस्थान भू राजस्व अधिनियम की धारा 75 तथा धारा 76 के अनुसार राजस्व अपीलीय अधिकारी के रूप में कार्य करना ।

० संभाग के सभी विभागों का समन्वय एवं पर्यवेक्षण।

० जन समस्याओं को सुनना और उसका निवारण करना।

० स्थानीय शासन पर नियंत्रण और निर्वाचित पदाधिकारियों को शपथ दिलाती है।

० स्थानीय शासन पदाधिकारियों के जैसे जिला प्रमुख आदि के त्यागपत्र स्वीकार करते है।

० संभागीय या जिला प्रशासन स्तर के प्रमुख अधिकारियों  की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट तैयार करवाना।

० तहसीलदारों एवं उनसे निम्न स्तरीय राजस्व अधिकारियों का तबादला।