पिछले दिनों पश्चिमी बंगाल विधानसभा के द्वारा राज्य में विधान परिषद के गठन की कवायद शुरू होने की खबरों के बीच एक बार फिर राजस्थान में भी अशोक गहलोत सरकार ने विधान परिषद के गठन की कवायत फिर से शुरू कर दी है।  मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में विधान परिषद के गठन को लेकर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया है, और राज्य सरकार इस बारे में केंद्र सरकार को अपनी राय भेजेगी । 

विधान परिषद के गठन का प्रस्ताव भेजने का निर्णय

विधान परिषद के गठन के लिए इससे पूर्व भी सन 2012 में अशोक गहलोत के सरकार के द्वारा प्रस्ताव तैयार कर भारत सरकार को प्रेषित किया था । भारत सरकार के विधि और न्याय मंत्रालय की ओर से 18 अप्रैल 2012 को विधानसभा में पारित हुए विधान परिषद के गठन के प्रस्ताव पर संसद की स्टैंडिंग कमेटी के दिए गए सुझावों के संदर्भ में राज्य सरकार की राय मांगी थी लेकिन पिछले 9 वर्षों के बाद अब जाकर सरकार ने विधान परिषद के गठन पर केंद्र सरकार को अपनी राय भेजने का मानस बनाया है। इसी के मध्यनजर मंत्रिपरिषद ने विधान परिषद के गठन  के लिए अपनी सर्वसम्मति से सरकार के दृष्टिकोण से अवगत कराने का निर्णय लिया है ।

वसुन्धरा सरकार ने भी केन्द्र को भेजा था  प्रस्ताव

राजस्थान में विधान परिषद के गठन को लेकर यह कोई पहला प्रस्ताव नहीं है वरन इससे पूर्व भी सन 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री  वसुंधरा राजे सिंधिया ने  भी ऐसा प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था लेकिन उसे केंद्र सरकार से स्वीकृति नहीं मिल पाई थी  ।  मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के दूसरे कार्यकाल  के समय सन 2012 में राजस्थान विधानसभा में विधान परिषद के गठन के प्रस्ताव भेजा था । विधि एवं न्याय मंत्रालय ने इस मामले पर संसद की स्टैंडिंग कमेटी के दिए गए सुझावों के बारे में राज्य सरकार से राय मांगी थी । लेकिन 9 वर्षो तक राज्य सरकार ने इस मामले में राय नहीं भेजी । अब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने यह निर्णय किया है कि इस प्रकार की राय केन्द्र सरकार को फिर से भेजी जाएगी ।

इस समिति के परामर्श पर शुरू हुई थी प्रक्रिया

शांताराम नायक समिति की सलाह पर राजस्थान में भी विधान परिषद के गठन की प्रक्रिया शुरू की गई थीं । 18 अप्रैल 2012 को राजस्थान विधानसभा में विधान परिषद के गठन के लिए प्रस्ताव पारित किया और इसे संसद को प्रेषित किया था। जहां संसद ने अपने साधारण बहुमत से इसे स्वीकार भी कर लिया और इस के बारे में राज्य सरकार से राय मांगी थी । अब राजस्थान में विधान परिषद का गठन प्रस्तावित है ।

अधिकतम सदस्य संख्या कितनी होगी

राजस्थान में विधान परिषद के गठन को अनुमति मिल जाती है तो उसके सदस्यों की संख्या का निर्धारण होगा । विधान परिषद के सदस्यों की अधिकतम संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्य संख्या का एक तिहाई  सदस्य हो सकते है इससे अधिक नही और न्यूनतम 40 से कम नही हो सकती है । राजस्थान विधानसभा में वर्तमान समय में 200 सदस्य है इस कारण राजस्थान विधान परिषद के सदस्यों की अधिकतम संख्या 66 हो सकती है ।

विधान परिषद गठन की यह है पूरी प्रक्रिया

किसी भी राज्य में विधान परिषद के गठन की प्रक्रिया का उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 169 में उल्लेखित है  । इस अनुच्छेद के अनुसार यदि राज्य विधानसभा अपने कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत के द्वारा उस राज्य में विधान परिषद के गठन का संकल्प पारित कर उसे संघीय संसद के पास स्वीकृति के लिये प्रेषित कर देती है ।  अनुच्छेद 171(2) के अनुसार  संसद के दोनों सदन लोकसभा और राज्यसभा अपने साधारण बहुमत से प्रस्ताव को स्वीकार या स्टैंडिंग कमेटी के दिए गए सुझावों के बारे में राज्य सरकार से राय मांग सकती है । 


साधारण बहुमत से पास करके उसे राष्ट्रपति के पास उनके हस्ताक्षर के लिए भेजा जाता है।राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद विधान परिषद का गठन  किया जा सकता है लेकिन यह एक लम्बी प्रक्रिया है और इसमें समय लग सकता है ।

ध्यातव्य 

विधान परिषद के सृजन की जिस प्रकार से प्रक्रिया अपनाई जाती है उसी प्रकार की प्रक्रिया से किसी भी राज्य में विधान परिषद को समाप्त भी किया जा सकता है।  सृजन और समाप्ति के प्रस्ताव सर्वप्रथम राज्य विधानसभा में ही लाया जाता है ।

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