स्वीडिश भाषा का शब्द ओंबुद्समैन जिसका अर्थ जन शिकायतों को सुनने वाला होता है। आखिरकार यह पद क्या है और इस पद का सर्वप्रथम किस देश में प्रचलन हुआ तो आपको बता दे की विश्व में पहला ओंबुद्समैन सन 1809 में स्वीडन में स्थापित हुआ था तथा भारतीय लोकपाल भी ओंबुद्समैन का ही संस्करण है।

  • भारत में लोकपाल और लोकायुक्त 

भारत में लोकपाल शब्द का सबसे पहली बार प्रयोग सन 1963 में लक्ष्मीमल सिंघवी द्वारा किया गया था। भारत में शासकीय कर्मचारियों की मनमानी,अक्षमता, उदासीनता तथा उसके भ्रष्टाचार के विरुद्ध नागरिकों को संरक्षण देने के उद्देश्य से संस्थागत व्यवस्थाओं का समय-समय पर सरकार के द्वारा प्रावधान किया गया।  

(जस्टिस पी सी घोष भारत के पहले लोकपाल)

स्वतंत्रता के बाद सबसे पहली बार सन 1962 में भ्रष्टाचार निवारण समिति जिसे के. संथानम समिति 1962 कहा जाता है का गठन किया गया था। उसी प्रकार 1964 में केंद्रीय सतर्कता आयोग जिसकी स्थापना के संथानम समिति 1962 के परामर्श पर की गई थी। केंद्रीय जांच ब्यूरो सीबीआई की स्थापना की गई थी। इसे केंद्रीय प्रशासनिक सुधार आयोग भी कहा जाता है। 

नागरिकों की शिकायत निवारण हेतु इस संस्था की स्थापना की गई थी। इससे पूर्व भारत में सर्वप्रथम प्रशासनिक सुधार समिति जिसे भी कहा जाता है। इस समिति ने सुझाव दिया था की भारत में भी ओंबुद्समैन जैसे पद की व्यवस्था की जाने की आवश्यकता है।  

  • इस वर्ष लाया गया था पहली बार विधेयक 

प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष के हनुमंत्या को बनाया गया था।  इस प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिश पर सर्वप्रथम 9 मई 1968 को तत्कालीन गृहमंत्री वाई वी चौहान द्वारा संसद में लोकपाल व लोकायुक्त विधेयक प्रस्तुत किया गया था। 

ज्ञात हो कि इस वक्त इंदिरा गांधी भारतीय प्रधानमंत्री थी इसके पश्चात अब तक ही है सन 1971,1977,1985,

1989,1996 ,1998, 2001 2005, 2008 और 2011 में लाया जा चुका है। 

प्रशासनिक सुधार आयोग 1966 और 1969 में दी थी लेकिन आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1968 में सरकार द्वारा लोकसभा में लोकसभा में लाया गया।

ध्यातव्य : प्रशासनिक सुधार आयोग 1966 ने अपने रिपोर्ट 1969 में दी थी लेकिन आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट 1968 में ही दे दी थी। इस आयोग की सलाह पर ही मई 1968 में श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रीत्व कार्यकाल में लोकपाल विधेयक राज्य सभा में लाया गया था।

  • लोकपाल एवं लोकायुक्त विधेयक 2013

दिसंबर 2011 में अब तक अंतिम बार लोकपाल विधेयक राज्य सभा में लाया गया लेकिन यह विधेयक लोकपाल व लोकायुक्त विधेयक 2013 के रुप में पारित हुआ। ज्ञात हो कि राज्यसभा में इसे 17 दिसंबर 2013 को और लोकसभा ने इसे 18 दिसंबर 2013 को पारित कर दिया तथा 1 जनवरी 2014 को माननीय राष्ट्रपति द्वारा इस पर हस्ताक्षर किए गए।

  • लोकपाल एवं लोकायुक्त विधेयक 2013 के प्रावधान

सदस्य संख्या : लोकपाल संस्था में एक अध्यक्ष/ सभापति के अलावा 8 अन्य सदस्यो का प्रावधान किया गया।

योग्यता: लोकपाल संस्था के अध्यक्ष ऐसा व्यक्ति जो सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश/ पूर्व न्यायाधीश या कोई भी प्रसिद्ध व्यक्ति रहा हो सकता है।

कुल सदस्य संख्या में से 50% सदस्य न्यायिक पृष्ठभूमि की होंगे जो सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के पूर्व या वर्तमान न्यायाधीश हो सकते हैं ।

इसके अतिरिक्त कुल सदस्यों में से 50% सदस्य अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग/ महिला तथा अल्पसंख्यक वर्ग से होंगे जिन्हें लगभग 25 वर्षों का प्रशासनिक अनुभव प्राप्त हो। 

न्यूनतम आयु : जहां तक उनकी आयु सीमा का सवाल है तो उनकी आयु 45 वर्ष होनी चाहिए।

  • यह नहीं हो सकते लोकपाल के सदस्य 

• सांसद/ विधायक /पंचायत समिति सदस्य /नगरपलिका सदस्य।

• लोकपाल के सदस्य नहीं किसी राजनीतिक दल से संबंधित कोई भी व्यक्ति इसका सदस्य नहीं बनाया जा सकता ।

• किसी लाभ के पद पर हो तो ऐसा व्यक्ति लोकपाल जैसी संस्था का सदस्य नहीं बन सकता। यदि सदस्य बनता है तो उसे लोकपाल में पद ग्रहण करने से पूर्व त्यागपत्र देना होगा। 

• किसी व्यवसाय या पैशे से जुड़ा हुआ हो वह व्यक्ति लोकपाल का सदस्य नहीं बनाया जा सकता।

  • लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्य की नियुक्ति 

 लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति के माध्यम से की जाती है जिस चयन समिति में अध्यक्ष सहित कुल 5 सदस्य होते हैं। 

इस चयन समिति का अध्यक्ष प्रधानमंत्री और सदस्यों में लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा के प्रतिपक्ष नेता, भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा चयन समिति की अनुशंसा पर राष्ट्रपति द्वारा एक सदस्य नामित किया जाता है। 

ध्यान देने योग्य बात लोकपाल के सभापति का दर्जा भारत में मुख्य न्यायाधीश के बराबर तथा सदस्य का दर्जा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर होता है।

  • कार्यकाल:  

लोकपाल संस्था के सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु पूर्ण होने तक होता है। 

• ध्यान देने योग्य बात है कि कोई भी व्यक्ति अपने पद पर पुनः नियुक्ति का पात्र नहीं हो सकता और सेवानिवृत्ति के पश्चात भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन कोई लाभ का पद प्राप्त नहीं कर सकता। 

• इसके अतिरिक्त वह किसी भी प्रकार के चुनाव के लिए अयोग्य होता है। 

• कार्यकाल पूर्ण होने से पूर्व उन्हें हटाया भी जा सकता है। हटाए जाने का आधार कदाचार और अक्षमता होता है। 

• इसके लिए संसद के कोई भी 100 सदस्यो द्वारा राष्ट्रपति से याचना करने पर इस याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जांच की जाती है।आरोप सही पाए जाने पर राष्ट्रपति उन्हें पद से हटा सकते हैं, लेकिन जांच के दौरान राष्ट्रपति ने निलंबित भी कर सकता है।

  • लोकपाल की शक्तियां और कार्य 

• सीपीसी 1908 (सिविल प्रोसीजर कोड 1908) के तहत लोकपाल समन जारी कर सकता है।समन एक ऐसा विधिक नोटिस है जिसके उल्लंघन पर वह दंड का पात्र होता है।

• शपथपत्र पर गवाही लेना, गवाही की ऑडियो/ वीडियो रिकॉर्डिंग करना। 

  • लोकपाल को निम्न शक्तियां भी प्राप्त होती है

• आरोपित अधिकारी का स्थानांतरण का आदेश दे सकता है। 

• सीबीआई को जांच करने का आदेश दे सकता है।  इस दौरान सीबीआई लोकपाल के प्रति उत्तरदाई होती है। 

• लोकपाल के स्वयं के न्यायालय होंगे जिन्हें 3 माह में मामले का निपटारा करना होता है लेकिन इसकी अधिकतम समय सीमा 12 महीने हो सकती है।

• दोषी अधिकारी से भ्रष्टाचार की राशि वसूल कर सकता है और दोषी अधिकारी की संपत्ति को कुर्क भी कर सकता है। 

  • लोकपाल का क्षेत्राधिकार 

• प्रधानमंत्री : प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में आता है लेकिन इसके द्वारा परमाणु ऊर्जा/अंतरिक्ष/ विदेश संबंध तथा लोक व्यवस्था के बारे में लिए गए निर्णय इसके दायरे से बाहर होते हैं।

• सांसद/मंत्री /पूर्व सांसद /पूर्व मंत्री यह सब इसके दायरे में आते हैं ।

• केंद्र सरकार के सभी मंत्री/पूर्व मंत्री/ सभी वर्तमान सांसद तथा पूर्व सांसद /केंद्रीय सेवाओं के सभी श्रेणियों के सभी अधिकारी तथा पूर्व अधिकारी। 

• संसदीय अधिनियम के माध्यम से स्थापित सभी संस्थाओं के सभी अधिकारी तथा कर्मचारी और सेवानिवृत्त अधिकारी इसके दायरे में आते हैं। 

• अखिल भारतीय सेवाओं के सभी अधिकारी/ पूर्व अधिकारी भी इसके दायरे में है। 

• विश्व के किसी भी भाग में कार्यरत भारत सरकार का अधिकारी तथा सेवानिवृत्त अधिकारी या कोई भी कर्मचारी । 

ध्यान देने योग्य बात है कि ……..

• लोकपाल स्वयं किसी प्रकार की सजा नहीं दे सकता। 

• लोकपाल ऐसे मामले की जांच नहीं कर सकता है जिसको घटित हुए 7 वर्ष गुजर चुके हो।

• झूठी शिकायत का दोषी पाए जाने पर 1 वर्ष की सजा तथा ₹ एक लाख का जुर्माना भी दे सकता है।

  • भारत के पहले लोकपाल कौन है

लोकपाल एवं लोकायुक्त विधेयक 2013 के पारित होने के बाद भारत के पहले लोकपाल सन 2019 में नियुक्त किए गए ज्ञात हो कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस पी.सी घोष देश के पहले लोकपाल बन गए है। राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से उनकी नियुक्ति की अधिसूचना जारी की गई थी।

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