प्रतिवर्ष 14 सितंबर को  हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है  ये कैसी विडंबना है की वर्ष में एक बार हिंदी को नारों में जनसभाओं में मीटिंग में बैठक में भरपूर सम्मान दिया जाता है और कर लेते हैं अपने कर्तव्य की इतिश्री वतन में  30% जनसंख्या ऐसी है जो हिंदी भाषा का प्रयोग नहीं करती। हिंदी विश्व में बोले जाने वाली चौथे नंबर की भाषा जबकि भारत जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा सबसे बड़ा राष्ट्र है।     1918 में महात्मा गांधी के मित्र नोनो ने हिंदी को जनमानस की भाषा कहा और इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की बात कही लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ऐसा नहीं हो पाया  आज भी इंतजार है इस दर्जे का चन्द लोगो ने जाति भाषा के भेदभाव के आधार पर राजनीति स्वार्थ के कारण  राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं  मिला  सका जिसकी वह हकदार है।

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविंद दास और व्यौहार राजेंद्र सिंह ने दक्षिण भारत की यात्रा की। उनका मुख्य उद्देश्य हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलवाना था।

कब मनाया जाता है हिंदी दिवस
  1949-1950 के दौर में  अंग्रेजी के बढ़ते प्रचलन के कारण हिंदी का अस्तित्व खतरे में था ऐसे संकट के दौर में कुछ हिंदी प्रेमी महानुभावों के प्रयास के परिणाम स्वरूप 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में  मनाए जाने का निर्णय किया 14 सितंबर को इस रूप में चुने जाने की सबसे बड़ी वजह है कि इस दिन हिंदी भाषा के पुरोधा व्यौहार राजेंद्र सिंह  जी का जन्मदिवस था जिन्होंने हिंदी भाषा  को उसका हक दिलाने ओर उसके  विकास  के लिए लंबा संघर्ष किया था 14 सितंबर 1949 को हिंदी का पहला हिंदी दिवस मनाया गया।

 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के साथ राजभाषा नीति भी लागू की गई। संविधान के अनुच्छेद 343(1) के तहत हिंदी को राजभाषा व देवनागरी लिपि को मानक रूप प्रदान किया। संविधान लागू होने के पश्चात सभी प्रशासनिक कार्यों के लिए हिंदी भाषा के प्रयोग के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा का प्रयोग भी किया जाएगा। संविधान में यह व्यवस्था इसलिए की गई कि उस समय दक्षिण लोग हिंदी भाषा से परिचित कम थे। 15 वर्ष की अवधि के लिए सभी प्रशासनिक कार्यों में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाएगा 1965 तक सभी लोग हिंदी भाषा सीख सकेंगे। इसके पश्चात प्रशासनिक कार्यों व संपूर्ण राष्ट्र में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया। देश की यह विडंबना रही कि 1965 के बाद  भी  हिंदी को राष्ट्रभाषा  का दर्जा नही मिल सका
   हमें आज भी इंतजार है उस दिन का हमें आज भी इंतजार है उस पुरोधा का जो हिंदी को उसका हक दिला सके हिंदी को राष्ट्रभाषा बना सकें ।

एक संविधान, एक टेक्स ,तो एक राष्ट्रभाषा क्यो नही ? 

पिछले दिनों सरकार के द्वारा जो कठोर निर्णय ओर सटीक निर्णय लिए गए उससे तो आमजन में वे  हिंदी प्रेमी व्यक्तियों में एक विश्वास जगा एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है कि शायद वह दिन भी जल्दी ही आयगा जब धर्म जाति संप्रदाय क्षेत्रवाद भाषावाद की संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर देश हित में राष्ट्र हित में आमजन के हित में एक देश एक संविधान एक झंडा एक टैक्स की तरह देश की राष्ट्रभाषा भी होगी ,

अगर मेरी बात आपके कानो तक पहुचे आपके भाव हिलोरे ले आपके मस्तिष्क के तंतुओ  तक पहुचे  तो  निश्चित रूप से वो दिन दूर नही जब हमारी भी एक राष्ट्र भाषा होगी ओर हमें भी गर्व होगा कि हमारी राष्ट्रभाषा है हिन्दी …हिन्दी ,

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