ख़ुश्क आंखों में नए ख़्वाब सजाने आई ,

पलके नींद से बोझिल हुई तेरी याद आई ।।

वक्त की धूप ने झुलसा दिया जब चेहरा मेरा।

काली घटा सी तेरी जुल्फ़ें मुझे बचाने आई।।

इश्क में मुसाफिर को मिली न कभी मंज़िल।

ये दर ओ दीवारें तुझ बिन बेरंग नजर आई।

रात ख़्वाब परी मेरी बाहों में लिपटी आकर।

जैसे कोई उल्फ़त की रस्म अदा करने आई।।

फूल कभी तोहफ़े में दिए मुझको उसने ।

कर्ज़ का वक्त बीता तकाजा करने आई।।

दफ़ना दी उसकी यादों को कब्र में अरसे से ,

गुलदस्ता लेकर मेरी बरसी पर फिर आई।।

कब्र में दफ़नाए हुए को जला नही सकते।

वो आज फिर रक़ीब संग मेरी कब्र पे आई।।

  • गोविन्द नारायण शर्मा सिंधोलियाँ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You cannot copy content of this page