खेतों में सरसों लहराये आई ऋतु बसन्त।
पीले परिधान सजी धरा दुल्हन दिगन्त।।
मरु माटी टेसू पल्लव जगे उल्लास लिए।
बल्लरी उलसित आलम्बन आस लिए।।
हरित रंग पहर घाघरा पीली ओढ़ी ओढ़नी।
पकी गेहूँ बाली मस्ती में झूमे वधु अवनी।।
पल्लव घूंघट ओढ़े कलियों पर भँवरे डोले।
फूलों को चूमने मंडराते तितलियों के डेरे।।
महकी खुशबू समेटे बहती मलयज पवन।
खिली गुलाबी धूप नीलाभ निर्मल गगन।।
तुहिन कण पत्तों पर बैठी रजत सी चमके।
नित नूतन रूप बदलते धरा गगन दमके।।
हरि सारी पीले फूलों का तारो जड़ा बन्ध।
मस्ती में बोराये रहे भँवरे पीकर मकरन्द।।
- स्वरचित मौलिक सृजन : गोविन्द नारायण शर्मा