अबीर गुलाल कोरे गोरे कपोलहु सोहते।
मृदंग ताल झांझ मंजीरे वीथियन बाजते ।।
होली की उमंग में मस्ती चुहुँ दिशि उड़ेलते।
रंग बिरंगी छटा से तन मन सकल मोहते।।
कुसुमित मलयज समीर मन्द डोलती।
नवेली बधू अनंग आगमन द्वार खोलती।।
रंग गुलाल हाथ लिए खड़े गोप किशोर।
बृज की गलियों में ठाड़े मचाये रहे शोर ।।
भिगोई चोली दामन तक मार पिचकारी।
हंसी ठिठोली कर रंग खेलती सुकुमारी ।।
गगन अबीर गुलाल उड़े श्यामल मेघ सी।
धरनी बनी आज रक्तिम उगते सूरज सी ।।
ढोल नगाड़े चंग थाप अलगोजा गूंज यहां।
रंग बिरंगी तितलियों सी उड़ती गोपी यहां ।।
पहन गोरी कलाई हरि इठलाती चूड़ियां।
मोहक कजरारे नयन से रंगती सखियां।।
कोई द्वेष भाव मन में शेष कलुष नही है ।
प्रेम सुगन्ध फैली अनूठी यही विशेष है ।।
गुझियां बांटते मिले गले सखा सब यहां।
चंग की थाप पर रसीले नाच गान यहां ।।
जलाओ राग द्वेष की कलुषित समिधा ।
ऊर्जस्वित रहे प्रेम सौहार्द्र से सदा वसुधा ।।
केसू के रंग में रँगा हुआ दुकूल धरा का ।
आनंदित चित निहार आलोक व्योम का ।।
कसी कमर गोपियों ने कोड़े लिए हाथ में।
कसकर मारे कोड़े सखाओ की पीठ में।।
भले प्रहार हो रहे तन पे प्रेम का उपहार है।
नील गगन रक्तिम धरा यही होली त्योहार है ।।
पकड़ी गोरी कलाई झुकी तनिक पलकियाँ।
मल रुखसार पर गुलाल दे रही घुड़कियाँ।।
भिगो चुनरी अंगिया विहंसे कन्हाई बावरे।
नखशिख रंगी राधिका को रंग में मतवारे।।
अबीर गुलाल बरसती पावन धरा धाम को।।
केसरिया क्षितिज स्वागत नए उल्लास को।
पपीहा पीव पीव करें कोयल गाये मृदु गान।
प्रकृति अनुपम छटा बिखरी सजा वितान ।।
रंग अबीर गुलाल सने जन शृंगारित चेहरे।
अन्तरंग सुखद सद्भाव पुनीत स्नेह घनेरे।।
आनन्दित उमंग उत्साह धमाल ढप चंग ।
बृज मण्डल गोपी संग माधव खेलत रंग।।
कान्हा ने जो रंगा तन छुड़ा नही पाई गोपी।
भीगी रूह का रंग न छूटा मलमल नहाई।।
नैन से नैन में डूबी तिरछी चितवन रंगीली।
प्रमुदित बृज मण्डल खेलत लठ मार होली।।
- गोविन्द नारायण शर्मा